रामगढ़ : 9 बच्चों के भविष्य के लिए रोज जंगल पार करता है 27 साल का शिक्षक

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उत्तराखंड: 9 बच्चों के भविष्य के लिए रोज जंगल पार करता है 27 साल का शिक्षक
उत्तराखंड: 9 बच्चों के भविष्य के लिए रोज जंगल पार करता है 27 साल का शिक्षक

हर्षित सांगुड़ी की कहानी करेगी भावुक

सीएनई डेस्क। पहाड़ों में सुबह अक्सर सड़क से नहीं, पगडंडी से शुरू होती है। कहीं धूप पहाड़ी की धार पर धीरे-धीरे उतरती है, तो कहीं जंगल की खामोशी के बीच किसी पक्षी की आवाज दिन के आगमन का संकेत देती है। लेकिन नैनीताल जिले के रामगढ़ क्षेत्र के एक दूरस्थ गांव में एक युवा शिक्षक की सुबह की कहानी कुछ अलग है।


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उनकी मंजिल कोई बड़ा शहर नहीं, न कोई प्रतिष्ठित विद्यालय। सामने हैं पहाड़, जंगल और एक छोटा-सा सरकारी प्राथमिक विद्यालय, जहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या महज नौ है।

और इन नौ बच्चों के लिए शिक्षक भी केवल एक।

नाम है हर्षित सांगुड़ी, उम्र 27 वर्ष।

हर दिन वह सड़क से उतरकर करीब 15 से 20 मिनट जंगल के रास्ते पैदल चलते हैं। इसके बाद उनके कमरे से अपने विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय करखोली रामगढ़ (नैनीताल) तक पहुंचने में भी लगभग 15 से 20 मिनट लगते हैं। यानी रोज का यह सफर केवल दूरी तय करना नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी तक पहुंचना है, जिसे उन्होंने अब नौकरी से कहीं आगे बढ़कर अपना उद्देश्य मान लिया है।

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नौ बच्चे हैं, लेकिन जिम्मेदारी नौ गुना नहीं—कहीं ज्यादा है

पहली नजर में किसी को लग सकता है कि नौ बच्चों को पढ़ाना भला कितना मुश्किल होगा। लेकिन प्राथमिक विद्यालय के अकेले शिक्षक हर्षित के लिए यह संख्या छोटी नहीं है।

विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक पढ़ाई होती है। उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, गणित, पर्यावरण अध्ययन और संस्कृत सहित अलग-अलग विषयों को पांच कक्षाओं के बच्चों तक पहुंचाना होता है। हर बच्चे की अपनी क्षमता है, अपनी गति है और अपनी जरूरत है।

किसी को किसी विषय में अतिरिक्त मदद चाहिए तो किसी को दोबारा समझाना पड़ता है। किसी बच्चे की पढ़ाई पीछे छूट रही है तो किसी की प्रगति पर नज़र रखनी होती है।

हर्षित कहते हैं कि नौ बच्चे होने का अर्थ यह नहीं है कि काम भी नौ गुना कम हो गया।

बल्कि एक ही शिक्षक होने के कारण जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। विद्यालय में छुट्टी लेना भी आसान नहीं। उनके स्थान पर पढ़ाने वाला दूसरा शिक्षक आसानी से उपलब्ध नहीं होता और इतने दूरस्थ क्षेत्र में किसी दूसरे शिक्षक के पहुंचने की अपनी कठिनाइयां हैं।

इस स्कूल की कहानी सिर्फ बच्चों की संख्या कम होने की कहानी नहीं है

जिस क्षेत्र में यह विद्यालय स्थित है, वहां पिछले वर्षों में कई परिवार बेहतर सड़क, सुविधाओं और रोजगार की तलाश में दूसरी जगह चले गए। गांवों में परिवार कम हुए तो बच्चों की संख्या भी घटती गई।

जब हर्षित ने विद्यालय संभाला था, तब वहां दस बच्चे थे। बाद में कक्षा तीन और पांच के कुछ बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए चले गए। नए दाखिलों से संख्या पूरी नहीं हो सकी और अब कक्षा एक से पांच तक कुल नौ बच्चे हैं।

लेकिन हर्षित ने बच्चों की कम होती संख्या को अपने काम की कम होती जरूरत नहीं माना।

उनके लिए प्रत्येक बच्चा एक पूरा भविष्य है।

जिन बच्चों के पास दो जोड़ी कपड़े नहीं, उनके शिक्षक ने महसूस की उनकी जरूरत

इन बच्चों में कई ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। यदि सरकारी स्तर से समय पर वर्दी नहीं पहुंचती, तो कई बच्चों को लंबे समय तक उसी वर्दी में रहना पड़ता है। किसी के जूते पुराने हैं, किसी के कपड़े पहाड़ की ठंड के लिए पर्याप्त नहीं।

हर्षित इन चीजों को देखकर आगे बढ़ नहीं जाते।

यदि किसी बच्चे को जूते की जरूरत है तो वह अपने स्तर पर जूते जुटाने की कोशिश करते हैं। कपड़े चाहिए तो उसके लिए भी प्रयास करते हैं।

शिक्षक की सरकारी जिम्मेदारी और मानवीय जिम्मेदारी के बीच उन्होंने कोई दीवार खड़ी नहीं की है। बच्चों की जरूरत उन्हें दिखाई देती है तो वह उसे नजरअंदाज नहीं कर पाते।

यही शायद इस कहानी का सबसे खूबसूरत पक्ष है।

क्योंकि बच्चों को पढ़ाना एक शिक्षक का दायित्व है, लेकिन किसी बच्चे के फटे जूते देखकर उसके लिए नया जूता तलाशना नौकरी की अनिवार्यता नहीं—यह संवेदना है।

हर्षित खुद भी कभी ऐसे बच्चे थे, जिसे लगा था कि उसकी बात कोई नहीं सुनता

शायद यही वजह है कि वह अपने विद्यार्थियों को केवल किताबों से नहीं देखते।

हर्षित जब अपने बचपन को याद करते हैं तो उनकी आंखों में भावुकता आ जाती है। उन्हें याद है कि कभी शिक्षक उनके पिता को शिकायत के लिए स्कूल बुला लेते थे। कभी डांट पड़ती थी, कभी मार भी। उन्हें लगता था कि शिक्षक यह समझने की कोशिश नहीं करते थे कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है।

उनके पिता स्कूल के पास ही एक दुकान चलाते थे। ऐसे में पिता को स्कूल बुलाया जाना उनके लिए और भी शर्मिंदगी का कारण बनता था।

एक बच्चे के मन में उस समय जो चोट बनी, वह वर्षों बाद भी हर्षित के भीतर मौजूद रही।

लेकिन उन्होंने उस चोट को शिकायत बनाकर नहीं रखा।

उसे अपने शिक्षक बनने की वजह बना लिया।

आज जब उनके सामने कोई बच्चा बैठता है तो वह केवल यह नहीं देखते कि वह पाठ याद कर रहा है या नहीं। वह यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि बच्चा कैसा महसूस कर रहा है।

सरकारी नौकरी की तैयारी से शुरू हुई थी दूसरी कहानी

हर्षित की जिंदगी में शिक्षक बनना शुरुआत से तय नहीं था।

मध्यवर्गीय परिवार के बहुत से युवाओं की तरह उनके सामने भी सुरक्षित सरकारी नौकरी का सपना रखा गया। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। कुछ समय हल्द्वानी में रहकर कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं के लिए कोचिंग भी ली।

लेकिन उन्हें जल्द महसूस हुआ कि उनके कई विषयों के मूल आधार मजबूत नहीं थे।

इसके बाद वह घर लौट आए और अपने स्तर पर तैयारी शुरू की।

उनकी दिनचर्या बदल गई। सुबह करीब पांच बजे उठना, दिन का बड़ा हिस्सा पढ़ाई में लगाना और बीच में केवल भोजन आदि के लिए रुकना—कई वर्षों तक यही जीवन रहा।

उन्होंने कर्मचारी चयन आयोग और उत्तराखंड की विभिन्न सरकारी भर्ती परीक्षाएं दीं। कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय और संयुक्त उच्चतर माध्यमिक स्तरीय परीक्षाओं के मुख्य चरण तक पहुंचे। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भी मुख्य चरण तक पहुंचे। पटवारी भर्ती प्रक्रिया के कुछ चरण, जिसमें शारीरिक परीक्षा भी शामिल थी, उन्होंने पार किए।

लेकिन अंतिम चयन बार-बार उनसे दूर रहा।

कई लोग ऐसी स्थिति में खुद को असफल मान लेते हैं।

हर्षित की कहानी यहां से बदलती है।

जिस परीक्षा को एक रास्ता समझकर दिया, वही मंजिल बन गई

हर्षित ने प्राथमिक शिक्षक बनने के लिए आवश्यक डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन की परीक्षा दी। यह दो वर्षीय शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से गणित, तर्कशक्ति, हिंदी और सामान्य ज्ञान में जो आधार बना था, उसका लाभ उन्हें इस परीक्षा में मिला। उन्होंने अच्छी रैंक हासिल की और नैनीताल क्षेत्र के जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश पाया।

उन्होंने 2025 की शुरुआत में अपना प्रशिक्षण पूरा किया।

फिर जनवरी 2026 में वह सरकारी विद्यालय के शिक्षक बन गए।

लेकिन असली बदलाव नौकरी मिलने के बाद आया।

कक्षा में बच्चों के बीच समय बिताते हुए हर्षित को महसूस हुआ कि शायद वह जिस चीज की तलाश इतने वर्षों से कर रहे थे, वह उनके सामने ही थी।

उन्हें बच्चों से बातचीत करना अच्छा लगने लगा। उनके साथ हंसना, मजाक करना और यह समझना अच्छा लगने लगा कि वे दुनिया को किस तरह देखते हैं।

और धीरे-धीरे शिक्षक की नौकरी उनके लिए नौकरी नहीं रही। वह एक ऐसा काम बन गई, जिसमें उन्हें अपने होने का अर्थ दिखाई देने लगा।

सोशल मीडिया पर बच्चों की दुनिया पहुंची बाहर

हर्षित ने विद्यालय के जीवन की कुछ झलकियां इंस्टाग्राम पर साझा करना शुरू किया।

मकसद खुद को प्रसिद्ध करना नहीं था। वह चाहते थे कि लोग देखें कि हिमालय के एक दूरस्थ गांव में बच्चों की शिक्षा कैसी परिस्थितियों में चलती है।

धीरे-धीरे लोगों का ध्यान इन बच्चों की ओर गया।

कुछ लोगों ने बच्चों की जरूरतों के बारे में जाना और मदद की पेशकश की। बच्चों को जरूरी सामान मिलने लगा। अभिभावकों को खुशी हुई और गांव के लोगों में भी अपने छोटे से विद्यालय को लेकर गर्व की भावना बढ़ी।

हर्षित के पिता भी उनके वीडियो देखते हैं और उनकी मां को दिखाते हैं।

एक छोटे से पहाड़ी स्कूल से निकलकर बच्चों की दुनिया अब उस गांव की सीमाओं से बाहर तक पहुंच रही है।

बड़ी नौकरी का रास्ता आज भी खुला है, लेकिन हर्षित ने फिलहाल उसे चुना नहीं

हर्षित के सामने आज भी आगे बढ़ने के कई रास्ते हैं।

रिश्तेदार उन्हें दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने या आगे की पढ़ाई जारी रखने की सलाह देते हैं। वह चाहें तो फिर किसी बड़ी सरकारी नौकरी की तैयारी कर सकते हैं।

लेकिन फिलहाल उनका मन अपने नौ बच्चों में लगा है।

इन बच्चों के लिए वह अकेले शिक्षक हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी जगह लेने वाला कोई दूसरा व्यक्ति आसानी से नहीं मिलता।

इसलिए हर्षित ने फिलहाल उस दौड़ से दूरी बना रखी है, जिसमें वह कई वर्षों तक दौड़ते रहे।

वह कहते हैं कि उन्हें यह काम अच्छा लग रहा है।

यह एक साधारण-सा वाक्य है, लेकिन इसके पीछे एक असाधारण निर्णय छिपा है।

जिस युवा ने वर्षों तक एक बड़ी सरकारी नौकरी पाने के लिए सुबह पांच बजे उठकर पढ़ाई की, वही युवा आज नौ बच्चों के भविष्य को अपने वर्तमान से अधिक महत्वपूर्ण मान रहा है।

नौ बच्चे… लेकिन नौ भविष्य

हो सकता है आने वाले वर्षों में इस विद्यालय में बच्चों की संख्या बढ़ जाए।

हो सकता है कम हो जाए।

हो सकता है किसी दिन हर्षित का स्थानांतरण किसी दूसरे विद्यालय में हो जाए।

लेकिन इस छोटी-सी पहाड़ी पाठशाला ने उन्हें एक ऐसी चीज दे दी है, जिसे कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं दे सकती थी—अपने काम के अर्थ का एहसास।

हर्षित के लिए शिक्षक होना अब केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है।

यह उस बच्चे को समझना है जो शायद घर में अपनी परेशानी नहीं बता पाता।

यह उस बच्चे के फटे जूते को देख लेना है जिसे वह खुद बताने में संकोच करता है।

यह उस गांव के खाली होते स्कूल में यह विश्वास बनाए रखना है कि बच्चों की संख्या कम होने से उनके सपनों की कीमत कम नहीं हो जाती।

और शायद सबसे बढ़कर यह उस पुराने बच्चे का जवाब है, जो कभी खुद महसूस करता था कि उसकी बात कोई नहीं सुनता।

आज उसी बच्चे के भीतर से निकला एक शिक्षक पहाड़ के एक छोटे से विद्यालय में बैठा है।

सामने नौ बच्चे हैं।

कक्षा छोटी है।

संसाधन सीमित हैं।

रास्ता जंगल से होकर जाता है।

लेकिन उस रास्ते के दूसरी ओर नौ सपने रोज उसका इंतजार करते हैं।

और हर्षित हर सुबह उन सपनों तक पहुंचने के लिए जंगल पार करते हैं।

यही इस कहानी की असली खूबसूरती है—कभी-कभी बदलाव करने के लिए बड़ी कुर्सी नहीं, केवल किसी के भविष्य तक पहुंचने की इच्छा चाहिए।

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