👉 अल्मोड़ा स्थित राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी-कटारमल में पं. गोविंद बल्लभ पंत स्मारक व्याख्यान
👉 पंडित जीबी पंत की जयंती और संस्थान का स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा में आज बुधवार यानी 10 सितंबर, 2025 को भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत का 138वां जन्मदिवस एवं संस्थान को स्थापना दिवस भव्य समारोह के साथ मनाया गया। व्याख्यान के वक्ता डा. जीएस रावत ने ‘भारतीय परा हिमालय के चारागाही क्षेत्रः परितंत्रीय सेवाओं और पशुचारा आधारित आजीविकाओं की निरन्तरता’ विषय पर गंभीरता से बात रखी और हिमालय से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए एकजुट प्रयासों की जरूरत बताई।


समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा एवं विशिष्ठ अतिथियों ने पंडित पंत की मूर्ति पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया। सर्वप्रथम संस्थान के निदेशक डा. आईडी भट्ट ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्थान एवं इसकी इकाईयों द्वारा हिमालय क्षेत्र में किए जा रहे शोधों एवं विकासात्मक कार्यों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने संस्थान की उपलब्धियों तथा जल, आजीविका, जलवायु एवं जैव विविधता के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों व शोधों विवरण भी प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विगत वर्षों में संस्थान ने जैव विविधता संरक्षण, सामाजिक एवं आर्थिक विकास, जलवायु परिवर्तन तथा जल व जमीन संसाधनों के प्रबंधन के क्षेत्र में समन्वित प्रयास किये हैं। डा. भट्ट ने बताया कि संस्थान विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए प्रयासरत है। इस मौके पर पंडित गोविंद बल्लभ पंत के हिमालय क्षेत्र के विकास के लिए दिए गए योगदान का उल्लेख किया और इसके पश्चात संस्थान की उपलब्धियों पर आधारित प्रगति रिपोर्ट एवं वीडियो फिल्म प्रस्तुत की गई। (आगे पढ़ें)
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अशोक कुमार साहनी ने 31वें पं. गोविंद बल्लभ पंत स्मारक व्याख्यान के वक्ता के रूप में पधारे वाडिया भू विज्ञान संस्थान देहरादून के पूर्व निदेशक डा. जीएस रावत का परिचय देते हुए उनके शोध कार्यों का उल्लेख किया। इसके बाद वक्ता डा. जीएस रावत ने ‘भारतीय परा हिमालय के चारागाही क्षेत्रः परितंत्रीय सेवाओं और पशुचारा आधारित आजीविकाओं की निरन्तरता’ विषय पर संस्थान का 31वां पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में चरागाही क्षेत्रों और मानव-जीव संघर्ष की बारीकियों से अवगत कराया। उन्होंने परा हिमालय के चारागाही क्षेत्रों की प्रमुख विशेषताएं बताईं और भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लद्दाख, चांगथांग, लाहौल-स्पीति, किन्नौर तथा उत्तरी सिक्किम के रेंजेलैण्ड की स्थितियों पर चर्चा की। व्याख्यान के जरिये उन्होंने परा हिमालयी क्षेत्र के चरागाहों के क्षरण, शीतकालीन चारे की कमी, सैज मेडोज/पीटलैण्ड का रूपांतरण, ऑफ-रोड ड्राइविंग से वन्यजीव विखंडन, स्थानीय विलुप्ति का खतरा, पर्यटन आधारित कचरा, मानव-वन्यजीव संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, चरम मौसमी घटनाओं, नीतिगत अभावों, संस्थागत समन्वय की कमी जैसे ज्वलंत मुद्दों को उजागर किया। साथ ही सामुदायिक संरक्षण आरक्षित क्षेत्रों, पर्यावरण अनुकूल पर्यटन के लिए गाइड लाइन तथा सामुदायिक संस्थाओं को सशक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रामक प्रजातियों ने हिमालयी क्षेत्रों में पायी जाने वाली महत्वपूर्ण और दुर्लभ प्रजातियों को समाप्ति की कगार पर पहुंचा दिया है। इसके समाधान के लिए हिमालयी क्षेत्रवासियों को एकजुट होकर आगे आने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हिमालय के बिना हमारा अस्तित्व नहीं है। इसलिए हिमालय से जुड़े सभी हितधारकों को नीतिगत समाधान कर इन प्रजातियों के प्रबंधन की दिशा में ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। (आगे पढ़ें)
मुख्य अतिथि केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा ने आजीविका वर्धन में सहायक शोध कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि पं. गोविन्द बल्लभ पन्त ने देश, समाज व मानव कल्याण के लिए अनेक कार्य किए और उनके आज हमें उनके कार्यों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पं. गोविंद बल्लभ पंत जैसे प्रखर और संघर्षशील नेता की जन्मस्थली में स्थित संस्थान आज अपने शोध और विकास कार्यो को वैश्विक स्तर पर फैला रहा है। जो हम सबके लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि वनाग्नि से प्रतिवर्ष सैकड़ों जीव जंतुओं व वनस्पतियों को क्षति पहुंचती है और उनका जीवन प्रभावित होता है। उन्होंने संस्थान से वनाग्नि की रोकथाम के लिए उचित सुझाव देने और कार्ययोजना बनाने की अपील भी की। (आगे पढ़ें)
विशिष्ठ अतिथि अतिथि स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति डा. राजेन्द्र डोभाल ने हिमालय में दीर्घकालिक जलवायु मॉडलिंग और खगोल-भौतिकीय अध्ययनों के समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाएं आज चिंता का विषय बनी हैं, ऐसे में हमें काफी शोध कार्य करने की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथि प्रख्यात प्रकृति छायाकार पद्मश्री डा. अनूप साह ने दुर्लभ व स्थानीय प्रजातियों की गैलरी निर्माण, स्थानीय ज्ञान के संरक्षण व बालकों-युवाओं में प्रकृति चेतना लाने पर जोर दिया। विशिष्ठ अतिथि एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह ने हिमालयी अनुसंधान को वैश्विक नेटवर्क से जोड़ने, सहयोगात्मक शोध व स्थानीय समुदायोन्मुख अनुसंधान की आवश्यकता बताई। विशिष्ठ अतिथि जिलाधिकारी आलोक पाण्डे ने संस्थान द्वारा विकसित सूर्यकुंज मॉडल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह मॉडल अल्मोड़ा समेत पूरे उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगा। विशिष्ठ अतिथि भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष कैलाश शर्मा ने कहा कि हिमालय क्षेत्र के लिए स्थापना से लेकर आज तक संस्थान ने काफी उत्कृष्ट कार्य किये, लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा तैयार नीतियों का समाज में आत्मसात किया जाना भी जरूरी है। (आगे पढ़ें)
समारोह में संस्थान के निदेशक द्वारा शुरू की गयी नवीन पहल के माध्यम से विगत वर्ष में सर्वश्रेष्ठ कार्य करने वाले शोधार्थियों व कर्मचारियों को पुरस्कार प्रदान किए गए। वहीं अतिथियों के हाथों संस्थान के नये प्रकाशनों का
विमोचन किया गया। समारोह में पयार्वरण मंत्रालय भारत सरकार की संयुक्त सचिव नमिता प्रसाद, वैज्ञानिक डा. सुसेन जॉर्ज, डा. एसके नन्दी, प्रो. जेसी कुनियाल ऑनलाइन माध्यम से कार्यक्रम से जुड़े। कार्यक्रम में मेयर अजय वर्मा, पद्मश्री डा. ललित पाण्डे, प्रो. आरके मैखुरी, प्रो. जेएस. रावत, प्रो. एलएम तिवारी, प्रो. पीके सामल, प्रो. सीएम शर्मा, डा. जीसीएस नेगी, डा. एसएस सामन्त, डा. नवीन जोशी तथा संस्थान के समस्त वैज्ञानिकों, शोधार्थियों एवं कर्मचारियों समेत लगभग 250 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का संचालन डा. प्रतीक्षा जोशी एवं पर्णिका गुप्ता ने किया जबकि समापन संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक ई. एमएस लोधी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

