अल्मोड़ा-नैनीताल सीमा पर नैनीपुल 15 साल से जर्जर है, जिससे तमाम गांवों के सैकड़ों लोगों और स्कूली बच्चों की जान को खतरा है — प्लेटें उखड़ीं, ग्रामीण और पूर्व प्रधान विपिन गुरूरानी ने शीघ्र मरम्मत की मांग की। जानें क्यों खतरे में है लाइफलाइन।
— अनूप सिंह जीना की रिपोर्ट —
सुयालबाड़ी। नैनीताल और अल्मोड़ा जनपदों की सीमा पर स्थित नैनीपुल की हालत अत्यंत जर्जर हो चुकी है। यह पुल सिर्फ दो जिलों के सैकड़ों नागरिकों और इंटर कॉलेज रैंगल के सैकड़ों स्कूली बच्चों के लिए मुख्य लाइफलाइन है। दुर्भाग्य से, पुल की प्लेटें (पटाल) उखड़ चुकी हैं और अब यह कभी भी ढह सकता है, जिससे किसी बड़ी दुर्घटना की आशंका लगातार बनी हुई है।
मुख्य समस्या: दशकों से उपेक्षित ‘नैनीपुल’
- जर्जर हालत: पुल की ऊपरी सतह पूरी तरह से उखड़ गई है, जिससे आवागमन करने वाले लोग, विशेषकर दोपहिया वाहन चालक और पैदल यात्री, हर पल खतरे का सामना कर रहे हैं।
- बच्चों पर खतरा: इंटर कॉलेज रैंगल के छात्रों को रोजाना इस खतरनाक पुल से गुजरना पड़ता है। स्थानीय बाजार जाने वाले नागरिक भी इसी पुल का प्रयोग करते हैं।
- मरम्मत की तारीख: स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पुल पर आखिरी बार 15 साल पहले काम हुआ था। तब से इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य डोबा विपिन गुरूरानी और ग्राम प्रधान ढटवाल गांव देव प्रसाद ने इस गंभीर लापरवाही पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह समस्या प्रशासन के संज्ञान में है, लेकिन ‘कोई देखने-सुनने वाला नहीं है।’

ग्राम प्रधान की सख्त मांग
गुरूरानी ने बताया कि यह पुल अल्मोड़ा जनपद के दर्जनों गांवों के लोगों को नैनीताल की ओर आवागमन की सुविधा प्रदान करता है। स्कूली बच्चों का यहां से निरंतर आवागमन रहता है, जिसके कारण पुल की मरम्मत प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहिए।
उन्होंने उत्तराखंड शासन-प्रशासन और जिला पंचायत से तत्काल इस जर्जर पुल की शीघ्र मरम्मत करवाने की मांग की है ताकि किसी भी तरह के जान-माल के नुकसान से बचा जा सके और स्थानीय निवासियों का जीवन सुगम हो सके।
बड़ा सवाल
सवाल यह उठता है कि दो जनपदों को जोड़ने वाले इतने महत्वपूर्ण पुल की लगातार उपेक्षा क्यों की जा रही है? क्या प्रशासन किसी गंभीर दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? स्थानीय ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया तो उन्हें सड़क पर उतर कर आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
अल्मोड़ा जनपद के एक दर्जन से अधिक गांवों—जिसमें पतलिया, रैंगल, डटवाल गांव, सैंज, सिरसा, कूल, चोपड़ा, बिरखन जैसे मुख्य गांव शामिल हैं—को हाईवे से जोड़ने वाला ऐतिहासिक नैनी झूला पुल अब खतरे का सबब बन चुका है। कोसी नदी के ऊपर बना यह पुल वर्ष 1960 में निर्मित हुआ था, लेकिन 65 वर्षों की अनदेखी और समय की मार ने इसे अत्यंत खस्ताहाल बना दिया है।
📍 क्यों बढ़ा खतरा?
- जर्जर रैंप और पटाल: पुल के रैंप में लगे कई पटाल (प्लेटें) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं या उखड़ गए हैं। इससे पुल पर चलना, विशेषकर रात के समय, अत्यंत जोखिमपूर्ण हो गया है।
- दोहरी उपयोगिता: यह पुल न केवल अल्मोड़ा जनपद के इन एक दर्जन गांवों की मुख्य आवाजाही का जरिया है, बल्कि नैनीताल जनपद के तमाम ग्रामीण भी इसी पुल से अल्मोड़ा जनपद के गांवों में आते-जाते हैं।
- किसानों की लाइफलाइन: स्थानीय सब्जी उत्पादक कास्तकार अपनी उपज को हाईवे तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह इसी पुल पर निर्भर हैं। पुल की यह दयनीय स्थिति उनके व्यापार और दैनिक जीवन दोनों को प्रभावित कर रही है।
- रात में खतरा दोगुना: ग्रामीणों का कहना है कि रात में आवाजाही के दौरान खतरा दोगुना हो जाता है, क्योंकि क्षतिग्रस्त पटालों के कारण दुर्घटना होने की आशंका हर पल बनी रहती है।
ग्रामीण बोले: “बार-बार आवाज उठाई, पर सुनवाई नहीं”
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने कई बार प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने इस गंभीर समस्या को उठाया है, लेकिन हर बार अनदेखी की गई। पुल की मरम्मत न होने से लोगों में भारी रोष है।
ग्रामीणों ने तत्काल पुल के क्षतिग्रस्त पटालों को बदलने और पूरे झूला पुल की मरम्मत एवं रखरखाव सुनिश्चित करने की मांग की है।

