बिशन सिंह मेहरा के प्रयास लाए रंग
— रमेश जड़ौत —
उत्तराखंड अल्मोड़ा के शिक्षक बिशन सिंह मेहरा ने प्राथमिक विद्यालय नौगांव में शुरू की अनूठी पहल। पलायन और आधुनिकता के दौर में बच्चों को मातृभाषा कुमाउनी और संस्कृति से जोड़कर जगा रहे हैं अपनी जड़ों के प्रति प्रेम। एक प्रेरणादायक कहानी।
अल्मोड़ा। देवभूमि उत्तराखंड, जो अपनी अनुपम संस्कृति और पहाड़ी बोलियों पर सदियों से गर्व करती आई है, आज एक गंभीर सांस्कृतिक संकट का सामना कर रही है। आधुनिकता की अंधी दौड़ और करियर की तलाश में युवा जिस तेजी से अपनी जड़ों से कट रहे हैं, उसने हमारी अनमोल कुमाउनी और गढ़वाली बोलियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
पहाड़ों से व्यापक पलायन हुआ है, अधिकांश युवा दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों की ओर रुख कर चुके हैं, और पीछे सिर्फ चौखटों की रखवाली करते बुज़ुर्ग ही बचे हैं। इस हृदयविदारक स्थिति में, जहां अगली पीढ़ी के बच्चों के लिए मातृभाषा केवल ‘पुरानी बात’ बनकर रह गई है, वहीं अल्मोड़ा के एक शिक्षक ने आशा की एक नई किरण जगाई है।
आजकल अंतरजातीय विवाहों का चलन बढ़ा है, और इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन इसका एक अनचाहा दुष्परिणाम यह सामने आया है कि नौकरी और पद-प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देते हुए जीवनसाथी चुनने वाले युवा अपनी संतानों को उनकी मूल भाषा से दूर कर रहे हैं। इन बच्चों के लिए कुमाउनी या गढ़वाली मात्र शब्द हैं, जिनका उपयोग वे न तो अपने घर में कर पाते हैं और न ही अपने आस-पास के माहौल में। जब भाषा ही मिटने लगती है, तो संस्कृति का लोप होना भी तय हो जाता है। ऐसे में, यह दर्द हर उस पहाड़ी व्यक्ति के मन में कसक पैदा करता है, जो अपनी मिट्टी और बोली से गहरा प्रेम करता है।
बच्चों को से कुमाउनी जोड़ना लक्ष्य
इन्हीं विचलित कर देने वाली परिस्थितियों के बीच, विकासखंड भैंसियाछाना अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय नौगांव के अध्यापक बिशन सिंह मेहरा ने एक अनूठी और अत्यंत महत्वपूर्ण मुहिम शुरू की है। उन्होंने इस सांस्कृतिक शून्य को भरने का बीड़ा उठाया है। उनका मानना है कि अगर बच्चे बचपन में ही अपनी मातृभाषा कुमाउनी से जुड़ जाएंगे, तो संस्कृति की डोर कभी नहीं टूटेगी। उनका यह अथक प्रयास केवल शिक्षा नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए सहेजने का एक भावपूर्ण अभियान है।
शिक्षक बिशन सिंह मेहरा की पहल: भाषा से संस्कृति की ओर लौटना
बिशन सिंह मेहरा ने न केवल पारंपरिक विषयों का शिक्षण जारी रखा है, बल्कि उन्होंने बच्चों को उनकी मातृभाषा कुमाउनी की मिठास से दोबारा परिचित कराने का बीड़ा उठाया है। उनकी इस पहल ने विद्यालय के माहौल को पूरी तरह बदल दिया है, जिसके सार्थक परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं:
- कुमाउनी संवाद का विकास: विद्यालय के छात्र-छात्राएं अब कक्षा के भीतर और बाहर आपस में कुमाउनी बोली में सहजता से बातचीत करने लगे हैं, जिससे उनकी भाषा पर पकड़ मजबूत हो रही है।
- मातृभाषा में वंदना: यह पहल का सबसे आकर्षक और भावुक हिस्सा है। बच्चों को विशेष प्रयास से कुमाउनी भाषा में सरस्वती वंदना पर निपुण बनाया गया है।
- आकर्षण का केंद्र: विद्यालय में नित्य कुमाउनी भाषा में होने वाली यह वंदना अब दूर-दूर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है, जो इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय बोली को जीवंत रखा जा सकता है।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण: श्री मेहरा का यह प्रयास मात्र एक शिक्षण पद्धति नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों की नई पीढ़ी को उनकी पहचान, उनके मूल और उनकी जड़ों से भावनात्मक रूप से जोड़ने का एक सफल मॉडल है। यह दिखाता है कि एक शिक्षक अपनी निष्ठा और प्रेम से कैसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Cultural Renaissance) ला सकता है।

