जानिए, क्या था पूरा मामला ?
CNE DESK : मदुरै (तमिलनाडु) की विशेष अदालत ने आज एक ऐसा फैसला सुनाया है जो सदियों तक नजीर बनेगा। 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘कानून की वर्दी’ पहनकर ‘कानून को कुचलने’ वालों के लिए सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। यह मामला दुनिया भर में पुलिसिया बर्बरता का चेहरा बन गया था।
Nine policemen sentenced to death in India over Covid custody killings

जून 2020 का समय था, पूरा देश कोरोना महामारी और सख्त लॉकडाउन की बंदिशों में जकड़ा हुआ था। पी. जयराज और उनके बेटे बेनिक्स साथानकुलम के बाज़ार में अपनी छोटी सी मोबाइल दुकान से परिवार का गुजारा कर रहे थे।
19 जून की शाम को पुलिस गश्त पर थी। आरोप सिर्फ इतना था कि जयराज ने दुकान बंद करने के सरकारी समय से महज 15-20 मिनट की देरी की थी। इसी मामूली सी बात पर पुलिसकर्मियों का अहंकार इतना बढ़ा कि उन्होंने जयराज को खींचकर थाने ले जाने का फैसला किया। जब बेटा बेनिक्स अपने पिता को छुड़ाने थाने पहुँचा, तो पुलिस ने उसे भी भीतर खींच लिया। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज की कल्पना से परे है।
थाने की वो रात: चीखें, खून और खाकी का अहंकार
जून 2020 की वह काली रात जब पूरी दुनिया कोरोना से लड़ रही थी, साथानकुलम पुलिस थाने में इंसानियत दम तोड़ रही थी। पिता जयराज और बेटे बेनिक्स को केवल दुकान खोलने के मामूली विवाद पर उठाया गया। थाने के भीतर उन्हें निर्वस्त्र कर लकड़ी के डंडों से पीटा गया। गवाहों के अनुसार, पुलिसकर्मी बारी-बारी से उन्हें तब तक पीटते रहे जब तक कि पिता-पुत्र की खाल नहीं उधड़ गई और वे बेहोश नहीं हो गए।
⚠️ बॉक्स: घटनाक्रम – उस रात थाने की कालकोठरी में क्या हुआ?
| समय और तारीख | घटना का खौफनाक विवरण |
| 19 जून (शाम): | जयराज को मामूली ‘कर्फ्यू उल्लंघन’ के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया। |
| 19 जून (रात): | बेनिक्स थाने पहुंचे। पुलिस ने दोनों को एक बंद कमरे में डालकर ‘थर्ड डिग्री’ देना शुरू किया। |
| यातना का प्रकार: | रात भर दोनों को निर्वस्त्र कर लकड़ी के लट्ठों से पीटा गया। गवाहों के अनुसार, पुलिसकर्मी “थक जाने तक” उन्हें पीटते रहे। |
| 20 जून (सुबह): | थाने के फर्श पर इतना खून था कि पुलिस ने दोषियों से ही उसे साफ करवाया। पिता-पुत्र के कपड़े इतनी बार भीगे कि उन्हें बार-बार लुंगी बदलनी पड़ी। |
| 22-23 जून: | न्यायिक हिरासत के दौरान पहले बेटे बेनिक्स (31) और फिर कुछ घंटों बाद पिता जयराज (58) ने तड़प-तड़प कर अस्पताल में दम तोड़ दिया। |
💡 टिप्पणी: मामूली अपराध पर ‘अघोषित मृत्युदंड’
यह सोचना भी रूह कंपा देता है कि जिस अपराध की सजा कानूनी तौर पर महज एक मामूली जुर्माना या कुछ घंटों की हिरासत हो सकती थी, उस पर साथानकुलम पुलिस ने स्वयं ही ‘जज और जल्लाद’ बनकर सजा-ए-मौत दे दी।
पुलिस का टॉर्चर केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि वह मानसिक और यौन रूप से भी इतना वीभत्स था कि जेल के डॉक्टरों और मजिस्ट्रेट ने भी अपनी रिपोर्ट में गहरी चोटों का जिक्र किया। पुलिसकर्मियों ने बेगुनाह पिता-पुत्र को “सबक सिखाने” के नाम पर अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकाली। यह ‘प्रोफेशनल’ पुलिसिंग नहीं, बल्कि वर्दी की आड़ में किया गया सुनियोजित कत्लेआम था।
एक विलाप – “उन खाली कुर्सियों का क्या होगा?”
माँ की सिसकियां और उजड़ा घर:
जयराज और बेनिक्स के घर में आज भी वो दो कुर्सियां खाली पड़ी हैं, जहाँ बैठकर वे रात का खाना खाते थे। उस रात पुलिस सिर्फ दो लोगों को नहीं ले गई थी, बल्कि एक माँ की उम्मीद और एक बहन के सुरक्षा कवच को हमेशा के लिए छीन ले गई।
आज अदालत ने 9 पुलिसकर्मियों के गले में फांसी का फंदा तो डाल दिया, लेकिन उन घावों का क्या, जो उस बूढ़ी माँ के दिल पर आज भी ताजे हैं? बेनिक्स की वो आखिरी पुकार आज भी साथानकुलम के उस थाने की दीवारों में गूँजती होगी— “साहब, मेरे पापा को छोड़ दो, उन्हें कुछ नहीं पता!”
मानवता की जीत
आज का फैसला उन सभी के लिए एक सबक है जो सत्ता के नशे में यह भूल जाते हैं कि उनकी लाठी बेगुनाहों की ढाल बनने के लिए है, न कि उनकी कब्र खोदने के लिए। 6 साल की लंबी लड़ाई के बाद, सत्य की जीत हुई है, लेकिन यह जीत भारी कीमत चुकाकर मिली है।
प्रमुख अपडेट्स:
- ऐतिहासिक फैसला: तत्कालीन इंस्पेक्टर एस. श्रीधर सहित सभी 9 दोषियों को फांसी के तख्ते तक भेजने का आदेश।
- कठोर टिप्पणी: जज मुथुकुमारन ने कहा— “रक्षक जब भक्षक बन जाए, तो कानून का सबसे सख्त चेहरा दिखना अनिवार्य है।”
- भारी जुर्माना: दोषियों पर ₹1.40 करोड़ का जुर्माना आयद, पूरी राशि पीड़ित परिवार को देने का निर्देश।
- सीबीआई की जीत: सीबीआई द्वारा पेश किए गए फॉरेंसिक सबूत और चश्मदीद गवाहों ने पुलिस की झूठी थ्योरी को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।


