SDM प्रियंका रानी ने दिए सख्त निर्देश
सीएनई रिपोर्टर, बागेश्वर। जन आस्था के केंद्र श्री बागनाथ मंदिर के समीप स्थापित शिव प्रतिमा का त्रिशूल खंडित होने के मामले में प्रशासन ने तत्काल संज्ञान लिया है। गुरुवार को उपजिलाधिकारी (SDM) प्रियंका रानी ने ग्रामीण निर्माण विभाग (RND) के अधिकारियों के साथ मौके का निरीक्षण किया और प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत कार्य शुरू करने के सख्त निर्देश दिए।
एसडीएम प्रियंका रानी ने निरीक्षण के दौरान स्पष्ट किया कि यह मामला सीधे तौर पर जन आस्था और श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को किसी भी प्रकार की देरी न करने और सुरक्षा मानकों का विशेष ध्यान रखते हुए कार्य को अविलंब पूरा करने का निर्देश दिया।
ग्रामीण निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता संजय भारती ने एसडीएम को आश्वस्त किया कि लोगों की गहरी आस्था को देखते हुए, त्रिशूल की मरम्मत का कार्य शीघ्र ही प्रारंभ कर दिया जाएगा।
यह घटना बागेश्वर के स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई थी, जिसके बाद प्रशासन की त्वरित कार्रवाई से लोगों ने राहत की सांस ली है। बागनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
🔱 बागनाथ मंदिर और त्रिशूल का धार्मिक महत्व
1. बागनाथ मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ
- उत्तराखंड की काशी: बागेश्वर नगर सरयू और गोमती नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है, जिसे धार्मिक रूप से “उत्तर की काशी” भी कहा जाता है। बागनाथ मंदिर इसी संगम स्थल पर स्थित है।
- व्याघ्रेश्वर (बाघ के स्वामी): पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्थान पर महर्षि मार्कण्डेय तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या को पूर्ण करने के लिए भगवान शिव ने स्वयं बाघ (व्याघ्र) का रूप धारण किया था, इसीलिए इस स्थान का नाम व्याघ्रेश्वर पड़ा, जो बाद में बागेश्वर हो गया।
- मंदिर का निर्माण: इस प्राचीन शिव मंदिर का अस्तित्व कत्यूरी शासन के समय 7वीं शताब्दी से माना जाता है। हालांकि, मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1602 ईस्वी में चंद वंश के राजा लक्ष्मी चंद द्वारा निर्मित करवाया गया था।
- दक्षिणमुखी शिवलिंग: यह उत्तराखंड में एकमात्र प्राचीन दक्षिणमुखी शिव मंदिर है, जिसमें शिव और पार्वती एक साथ स्वयंभू रूप में जलहरी के मध्य विद्यमान हैं।
2. शिव प्रतिमा और त्रिशूल का महत्व
- त्रिशूल (Trident): त्रिशूल भगवान शिव का सबसे प्रमुख अस्त्र और पहचान है। यह केवल एक हथियार नहीं है, बल्कि गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ रखता है:
- तीन गुण (त्रिगुण): यह सत्व, रजस और तमस (सृष्टि के तीन मूलभूत गुण) का प्रतीक है। शिव इन तीनों गुणों के स्वामी हैं।
- तीन काल (त्रिकाल): यह भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल पर शिव के नियंत्रण को दर्शाता है।
- तीन लोक (त्रिलोक): यह स्वर्ग (स्वर्ग लोक), पृथ्वी (मृत्यु लोक) और पाताल (पाताल लोक) को दर्शाता है, जिन पर शिव का अधिकार है।
- अखंडता का प्रतीक: शिव प्रतिमा के पास त्रिशूल की स्थापना यह दर्शाती है कि भगवान शिव शक्ति, संहार और सृष्टि के नियमों के नियंता हैं, और अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। त्रिशूल का खंडित होना, इसलिए, श्रद्धालुओं के लिए एक संवेदनशील विषय बन जाता है।
- खंडित होने पर आस्था: चूंकि त्रिशूल शिव की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, इसका खंडित होना स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के लिए गहन धार्मिक चिंता का विषय बन जाता है। यही कारण है कि प्रशासन ने इसे जन आस्था से जुड़ा मामला मानते हुए त्वरित मरम्मत के निर्देश दिए हैं।
यह मंदिर उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है, जहाँ शिवरात्रि और उत्तरायणी जैसे पर्वों पर विशाल मेले लगते हैं।

