बागेश्वर के वज्यूला में बनेगा वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर, 1.60 करोड़ रुपये की मिली स्वीकृति

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बागेश्वर के वज्यूला में बनेगा वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर, 1.60 करोड़ रुपये की मिली स्वीकृति
बागेश्वर के वज्यूला में बनेगा वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर, 1.60 करोड़ रुपये की मिली स्वीकृति

75 नाली भूमि पर होगा निर्माण, लेपर्ड, लंगूर और बंदरों को रखने की मिलेगी सुविधा

जिले की छह वन रेंजों में गठित हुईं क्विक रिस्पांस टीमें

CNE ROPORTER, बागेश्वर। जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष की लगातार बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने और वन्यजीवों के संरक्षण एवं सुरक्षित पुनर्वास की दिशा में वन विभाग ने महत्वपूर्ण पहल की है। जिले के वज्यूला में वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर स्थापित किया जाएगा। इसके निर्माण के लिए 1 करोड़ 60 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति मिल गई है। करीब 75 नाली भूमि पर विकसित होने वाले इस रेस्क्यू सेंटर में लेपर्ड (गुलदार), लंगूर, बंदर सहित अन्य वन्यजीवों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाएगी। सेंटर के अस्तित्व में आने से वन्यजीवों के रेस्क्यू के बाद उनके उपचार, देखरेख और अस्थायी संरक्षण के लिए दूसरे जिलों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।


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दरअसल, पर्वतीय क्षेत्रों में मानव और वन्यजीवों के बीच लगातार बढ़ता टकराव वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जंगलों से निकलकर वन्यजीवों का आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचना, खेतों और बस्तियों के आसपास उनकी सक्रियता तथा बंदरों के बढ़ते आतंक से ग्रामीणों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार वन्यजीवों के रिहायशी इलाकों में पहुंचने अथवा घायल अवस्था में मिलने पर उनके रेस्क्यू के बाद सुरक्षित रखने और उचित देखभाल की व्यवस्था करना विभाग के सामने चुनौती बन जाता है। ऐसे में बागेश्वर में ही रेस्क्यू सेंटर की स्थापना को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

दूसरे जिलों पर निर्भरता होगी कम

प्रभागीय वनाधिकारी प्रकाश आर्या ने बताया कि वज्यूला में वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर निर्माण के लिए 1.60 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है। इसके निर्माण से जिले में रेस्क्यू किए जाने वाले वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे जिलों में भेजने की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी। स्थानीय स्तर पर ही वन्यजीवों को रखने और उनकी देखरेख की सुविधा उपलब्ध होने से रेस्क्यू अभियान को भी गति मिलेगी। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित सेंटर में लेपर्ड, लंगूर, बंदर सहित अन्य वन्यजीवों को रखने की व्यवस्था की जाएगी।

568 बंदरों को पकड़ चुका है वन विभाग

इधर, जिले में बंदरों के बढ़ते आतंक से लोगों को राहत दिलाने के लिए वन विभाग का अभियान भी लगातार जारी है। बंदरों के झुंड खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ ही आबादी वाले क्षेत्रों में लोगों के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। इस समस्या से निपटने के लिए विभाग की टीमें नियमित रूप से बंदरों को पकड़ने का अभियान चला रही हैं। प्रभागीय वनाधिकारी के अनुसार, अब तक जिले में 568 बंदरों को पकड़ा जा चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बंदरों को पकड़ने का अभियान आगे भी जारी रहेगा, ताकि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को राहत मिल सके।

छह वन रेंजों में गठित की गईं क्यूआरटी टीमें

मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए वन विभाग ने जिले की सभी छह वन रेंजों में क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) का गठन भी कर दिया है। प्रत्येक टीम में एक वाहन के साथ पांच कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी। इन टीमों को वन्यजीवों के आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने, वन्यजीवों से संबंधित शिकायत मिलने और आपात परिस्थितियों में तत्काल मौके पर पहुंचकर आवश्यक कार्रवाई करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

क्यूआरटी टीमों के गठन से वन्यजीवों की आवाजाही वाले संवेदनशील क्षेत्रों में विभाग की सक्रियता बढ़ेगी। किसी क्षेत्र से गुलदार या अन्य वन्यजीव के दिखाई देने अथवा उसके कारण खतरा उत्पन्न होने की सूचना मिलने पर टीम शीघ्र मौके पर पहुंच सकेगी। इससे समय रहते स्थिति को नियंत्रित करने और संभावित दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलने की उम्मीद है।

संरक्षण और सुरक्षा दोनों पर रहेगा जोर

बागेश्वर में वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर की स्थापना, बंदरों को पकड़ने का अभियान और छह वन रेंजों में क्यूआरटी टीमों का गठन वन विभाग की तैयारियों को नई मजबूती देने वाला कदम है। एक ओर जहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को कम करने और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

वज्यूला में प्रस्तावित रेस्क्यू सेंटर के निर्माण के बाद जिले में वन्यजीव संरक्षण और रेस्क्यू संबंधी व्यवस्थाओं का स्थानीय स्तर पर विस्तार होगा। इससे वन विभाग की कार्यक्षमता बढ़ने के साथ ही वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष को नियंत्रित करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

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