क्या कुछ सोचने-समझने के लिए दिमाग जरूरी है?

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क्या कुछ सोचने-समझने के लिए दिमाग जरूरी है?
क्या कुछ सोचने-समझने के लिए दिमाग जरूरी है?

वैज्ञानिकों को चुनौती दे रहा एक छोटा-सा जीव, जो बिना मस्तिष्क के रास्ते खोजता और फैसले लेता दिखाई देता है

विशेष विज्ञान रिपोर्ट | कल्पना कीजिए, आपके सामने एक भूलभुलैया है। कई रास्ते हैं, कुछ बंद हैं और कहीं दूर भोजन रखा है। आप सही रास्ता चुनने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल करेंगे। लेकिन अगर कोई ऐसा जीव हो, जिसके पास न दिमाग है, न तंत्रिका तंत्र और न ही सोचने-समझने के लिए कोई जाना-पहचाना अंग, फिर भी वह रास्तों को परखते हुए भोजन तक पहुंचने का रास्ता खोज ले, तो आप क्या कहेंगे?


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पहली नजर में यह किसी विज्ञान-कथा का दृश्य लग सकता है। लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में एक ऐसा ही जीव शोधकर्ताओं के सामने लगातार नए सवाल खड़े कर रहा है। इसका नाम है स्लाइम मोल्ड (Slime Mould) और इसकी चर्चित प्रजाति Physarum polycephalum है।

यह कोई छोटा कीड़ा नहीं, बल्कि एक असामान्य जीव है, जो अपने आसपास के वातावरण से संकेत ग्रहण करता है, अपना फैलाव बदलता है और कई परिस्थितियों में ऐसे रास्ते चुनता दिखाई देता है, जिन्हें देखकर वैज्ञानिकों को निर्णय लेने और स्मृति जैसी क्षमताओं पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है।

सवाल सीधा है—क्या बुद्धिमत्ता के लिए दिमाग का होना अनिवार्य है, या प्रकृति ने जानकारी जुटाने और उसके आधार पर व्यवहार बदलने के ऐसे तरीके भी विकसित किए हैं, जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं?

एक कोशिका, लेकिन व्यवहार किसी जटिल व्यवस्था जैसा!

स्लाइम मोल्ड की सबसे हैरान करने वाली विशेषता इसकी बनावट है। इसके सक्रिय, फैलते हुए रूप में एक विशाल कोशिकीय संरचना होती है, जिसमें एक ही साझा कोशिकाद्रव्य के भीतर अनेक केंद्रक मौजूद रहते हैं। इसमें मनुष्यों या दूसरे अनेक जंतुओं जैसा मस्तिष्क नहीं होता। न ही इसमें तंत्रिका कोशिकाओं का ऐसा जाल होता है, जो हमारे विचारों, यादों और फैसलों को संचालित करता है।

इसके बावजूद यह अपने वातावरण में भोजन की तलाश कर सकता है और अपने फैलाव की दिशा बदल सकता है। इसके शरीर में द्रव का लयबद्ध प्रवाह होता है। शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले संकुचन और द्रव की आवाजाही इसके फैलाव को प्रभावित करते हैं।

यही वह बिंदु है, जहां वैज्ञानिकों की दिलचस्पी बढ़ जाती है। यदि किसी जीव में मस्तिष्क ही नहीं है, तो वह बाहरी परिस्थितियों की जानकारी को अपने व्यवहार में कैसे बदलता है?

इसका अर्थ यह नहीं कि यह जीव मनुष्य की तरह विचार करता है। लेकिन इसके व्यवहार से पता चलता है कि वातावरण को महसूस करना और उसके अनुसार प्रतिक्रिया देना केवल मस्तिष्क वाले जीवों तक सीमित नहीं है।

भूलभुलैया में रास्ता खोजने का कमाल

स्लाइम मोल्ड पर शोध की चर्चा कोई बिल्कुल नई बात नहीं है। वर्ष 2000 के आसपास जापानी वैज्ञानिकों ने इसके भूलभुलैया में रास्ता खोजने की क्षमता पर महत्वपूर्ण प्रयोग किए थे। बाद के वर्षों में भी इस जीव ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा।

प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने भोजन को भूलभुलैया के अलग-अलग स्थानों पर रखा। स्लाइम मोल्ड को ऐसी व्यवस्था में छोड़ा गया, जहां उसे भोजन तक पहुंचने के लिए अपने फैलाव की दिशा बदलनी थी। कुछ परिस्थितियों में वह भोजन तक पहुंचने वाला रास्ता खोजने में सफल रहा।

इससे भी अधिक चर्चित एक प्रयोग में वैज्ञानिकों ने जापान के टोक्यो शहर और उसके आसपास के 35 कस्बों की स्थिति से मिलता-जुलता नमूना तैयार किया। अलग-अलग स्थानों पर भोजन रखा गया और स्लाइम मोल्ड को फैलने दिया गया। समय के साथ उसकी नलिकाओं जैसी संरचनाओं ने भोजन के स्थानों को जोड़ने वाला एक नेटवर्क बनाया।

इस नेटवर्क की तुलना टोक्यो के रेलमार्गों से की गई, क्योंकि इसमें कुछ ऐसे गुण दिखाई दिए जो एक प्रभावी परिवहन नेटवर्क में उपयोगी होते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि स्लाइम मोल्ड ने किसी नक्शे को पढ़कर या रेलमार्गों का ज्ञान हासिल करके यह काम नहीं किया था। उसका फैलाव स्थानीय परिस्थितियों, भोजन की उपलब्धता और उसकी अपनी जैविक गतिविधियों से प्रभावित हुआ।

यह प्रयोग इस बात का प्रमाण नहीं है कि जीव मनुष्य की तरह योजना बनाता है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि जटिल और उपयोगी नेटवर्क तैयार करने के लिए हमेशा किसी केंद्रीय नियंत्रक की जरूरत नहीं होती।

जून 2026 का शोध: फैसले लेने की प्रक्रिया का एक नया सुराग

इस विषय पर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी अब केवल यह देखने तक सीमित नहीं है कि स्लाइम मोल्ड क्या कर सकता है। वे यह भी समझना चाहते हैं कि वह ऐसा करता कैसे है।

8 जून 2026 को वैज्ञानिक पत्रिका PRX Life में प्रकाशित एक शोध ने इसी दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी दी। म्यूनिख के तकनीकी विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया कि सीमित जगह में फंसे स्लाइम मोल्ड का शरीर किस तरह अपने फैलाव और आंतरिक द्रव-प्रवाह को व्यवस्थित करता है।

शोध में पाया गया कि जीव के शरीर में होने वाले लयबद्ध संकुचन और द्रव की आवाजाही उसके खोजने के तरीके से जुड़े हैं। अलग-अलग दिशाओं में फैलने की कोशिश के बाद उसकी गतिविधि समय के साथ बदल सकती है और कुछ परिस्थितियों में वह बाहर निकलने के अधिक प्रभावी रास्ते की ओर बढ़ता है।

इससे वैज्ञानिकों को संकेत मिलता है कि किसी केंद्रीय मस्तिष्क के बिना भी शरीर की भौतिक प्रक्रियाएं वातावरण से मिली जानकारी को व्यवहार में बदलने में भूमिका निभा सकती हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो इस जीव के भीतर कोई छोटा-सा मानव जैसा दिमाग छिपा नहीं है। उसकी कोशिकीय बनावट, संकुचन और द्रव का प्रवाह मिलकर ऐसा व्यवहार पैदा कर सकते हैं, जिसे बाहर से देखने पर निर्णय लेने जैसा समझा जाता है।

यह शोध इस रहस्य को पूरी तरह सुलझा नहीं देता, लेकिन यह समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि बिना तंत्रिका तंत्र वाला जीव अपने वातावरण के अनुसार अपने व्यवहार को कैसे व्यवस्थित कर सकता है।

क्या इस जीव में याददाश्त भी होती है?

यहीं से मामला और रोचक हो जाता है।

कुछ प्रयोगों में स्लाइम मोल्ड के व्यवहार से संकेत मिले हैं कि वह पहले से खोजे गए स्थानों और रास्तों के बारे में उपयोगी जानकारी बनाए रख सकता है। उदाहरण के लिए, उसकी छोड़ी हुई श्लेष्मा जैसी परत यह संकेत दे सकती है कि वह किसी स्थान से पहले गुजर चुका है। इससे उसे दोबारा उसी रास्ते पर फैलने के बजाय दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़ने में मदद मिल सकती है।

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की जानकारी का बने रहना स्मृति जैसी प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन इसे मनुष्य की याददाश्त के समान मान लेना सही नहीं होगा।

2026 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने स्लाइम मोल्ड को अलग-अलग दूरी वाले टी-आकार के रास्तों से गुजरने दिया। 1,274 नमूनों पर किए गए परीक्षणों में एक बहुत छोटी दूरी वाले रास्ते में एक खास प्रकार का बारी-बारी से दिशा चुनने वाला व्यवहार महत्वपूर्ण पाया गया। अधिक दूरी वाले रास्तों में यही प्रभाव स्पष्ट नहीं था।

शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि अभी यह निश्चित नहीं है कि यह व्यवहार वास्तविक स्थानिक स्मृति के कारण था या भूलभुलैया की बनावट से पैदा हुआ था।

यही विज्ञान की खूबसूरती है—एक प्रयोग किसी सवाल का दरवाजा खोलता है, लेकिन उसके पीछे कई नए सवाल भी खड़े हो जाते हैं।

वैज्ञानिकों में बहस: बुद्धिमत्ता आखिर है क्या?

ब्रिटिश समाचार पत्र द गार्जियन ने 8 सितंबर 2026 को प्रकाशित अपनी विस्तृत रिपोर्ट में इसी विषय पर चल रही वैज्ञानिक बहस को प्रमुखता दी। बहस का मूल सवाल है कि क्या बिना मस्तिष्क वाले जीवों के व्यवहार को बुद्धिमत्ता, सीखने या स्मृति की संज्ञा दी जानी चाहिए।

कुछ वैज्ञानिकों का तर्क है कि जानकारी ग्रहण करना, अनुभव के अनुसार व्यवहार बदलना और परिस्थितियों के अनुरूप प्रतिक्रिया देना जीवन की बहुत बुनियादी विशेषताएं हो सकती हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, बुद्धिमत्ता को केवल मस्तिष्क वाले जीवों तक सीमित करके देखना प्रकृति की क्षमताओं को कम करके आंकना होगा।

दूसरी ओर, कई वैज्ञानिक सावधान करते हैं कि किसी जीव का जटिल व्यवहार दिखाना और उसका मनुष्य की तरह सोचना दो अलग बातें हैं। यदि हम हर अनुकूल प्रतिक्रिया को बुद्धिमत्ता कहने लगें, तो इस शब्द का अर्थ ही अस्पष्ट हो सकता है।

यह बहस केवल शब्दों की नहीं है। इसके केंद्र में यह प्रश्न है कि सीखना, स्मृति और निर्णय लेने जैसी क्षमताएं जीवन के विकासक्रम में कब और किन जैविक प्रक्रियाओं से उभरीं।

स्लाइम मोल्ड के प्रयोग इस सवाल को नया महत्व देते हैं, लेकिन वे यह साबित नहीं करते कि मनुष्य और यह जीव एक ही तरह से सोचते हैं।

क्या इससे मानव मस्तिष्क के रहस्य भी सुलझ सकते हैं?

इस शोध का महत्व केवल एक विचित्र जीव तक सीमित नहीं है।

यदि वैज्ञानिक यह समझ सकें कि बिना तंत्रिका तंत्र वाला जीव अपने वातावरण की जानकारी कैसे जुटाता है, उसे अपनी कोशिकीय गतिविधियों से कैसे जोड़ता है और उसके अनुसार अपना व्यवहार कैसे बदलता है, तो इससे जीवन में सूचना-प्रसंस्करण की बुनियादी प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिल सकती है।

यह ज्ञान भविष्य में ऐसे रोबोट या स्वचालित प्रणालियां विकसित करने के लिए भी उपयोगी हो सकता है, जो किसी एक केंद्रीय नियंत्रक पर पूरी तरह निर्भर न हों। इसके अलावा, कोशिकाओं की सामूहिक गतिविधि और शरीर की भौतिक प्रक्रियाओं से जटिल व्यवहार पैदा होने की समझ जीवविज्ञान और जैव-प्रेरित तकनीक के लिए नए रास्ते खोल सकती है।

हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि स्लाइम मोल्ड की खोज से मानव मस्तिष्क के सारे रहस्य सुलझ जाएंगे। दोनों की संरचना और क्षमताओं में बहुत बड़ा अंतर है। वैज्ञानिकों के लिए यह जीव किसी तैयार उत्तर से अधिक एक महत्वपूर्ण शोध-मंच है।

प्रकृति का संदेश: हर जटिल काम के पीछे दिमाग ही हो, यह जरूरी नहीं

मनुष्य ने अपनी बुद्धिमत्ता के आधार पर विज्ञान, तकनीक और सभ्यता की विशाल इमारत खड़ी की है। इसलिए हमारे लिए यह मानना स्वाभाविक है कि किसी भी जटिल काम के पीछे दिमाग और सोचने की प्रक्रिया होनी चाहिए।

लेकिन प्रकृति के पास ऐसे समाधान भी हैं, जो हमारी परिचित धारणाओं से अलग हैं। स्लाइम मोल्ड इसका एक दिलचस्प उदाहरण है। एक असामान्य कोशिकीय संरचना, आंतरिक द्रव का प्रवाह और वातावरण से मिलने वाले संकेत मिलकर ऐसा व्यवहार उत्पन्न कर सकते हैं, जिसे हम सहज रूप से बुद्धिमत्तापूर्ण समझते हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि यह जीव मनुष्य से अधिक बुद्धिमान है या इसके भीतर चेतना मौजूद है। अभी ऐसे दावों के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। असली खोज इससे कहीं अधिक सूक्ष्म है—जीवन में जानकारी ग्रहण करने, परिस्थितियों के अनुरूप बदलने और प्रभावी व्यवहार पैदा करने के तरीके हमारी अपेक्षा से अधिक विविध हो सकते हैं।

और यही बात हमें अपने सबसे पुराने सवाल पर लौटने के लिए मजबूर करती है।

क्या कुछ सोचने-समझने के लिए दिमाग जरूरी है, या दिमाग तो प्रकृति द्वारा विकसित किए गए अनेक समाधानों में से केवल एक है?

स्लाइम मोल्ड इस प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं देता। लेकिन वह इतना जरूर करता है कि हमें प्रश्न को नए सिरे से पूछने पर मजबूर कर देता है।

शायद विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि हमेशा कोई अंतिम जवाब ढूंढ लेना नहीं होती। कभी-कभी वह ऐसी छोटी-सी खोज भी होती है, जो हमारी दुनिया को देखने का पूरा नजरिया बदलने की शुरुआत कर देती है।

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