शमशेर सिंह बिष्ट की आठवीं पुण्यतिथि पर आयोजित परिचर्चा में पर्यावरण
पर्यटन और पहाड़ की चुनौतियों पर उठे गंभीर सवाल
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। जन आंदोलनों के प्रखर योद्धा और पहाड़ की समस्याओं को मुखरता से उठाने वाले डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की आठवीं पुण्यतिथि पर अल्मोड़ा में ‘अनियंत्रित विकास से घायल हिमालय’ विषय पर विस्तृत परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा में हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय संकट, अनियंत्रित पर्यटन, ग्लोबल वार्मिंग, जल एवं वायु प्रदूषण, नदी घाटियों में बढ़ता शहरीकरण तथा पहाड़ की मूलभूत समस्याओं को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ जनगीतों के साथ हुआ। परिचर्चा का संचालन करते हुए दयाकृष्ण काण्डपाल ने कहा कि हिमालय के पर्वतीय भू-भाग में सामाजिक और राजनीतिक एकता के निर्माण में डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट तथा उनके साथियों का योगदान अविस्मरणीय रहा है। उन्होंने कहा कि बिष्ट ने पहाड़ के जनजीवन से जुड़े सवालों को केवल स्थानीय मुद्दे के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें व्यापक सामाजिक सरोकारों और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर संघर्ष को नई दिशा दी।
विकास की मौजूदा अवधारणा पर उठे सवाल
मुख्य वक्ता कुमार कलानंद मणि ने डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्हें चिपको आंदोलन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की चेतना को मजबूत करने तथा मद्यपान जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष के लिए हमेशा याद किया जाना चाहिए।
उन्होंने वर्तमान विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस ऑक्सीजन को प्रकृति ने मनुष्य को नि:शुल्क उपलब्ध कराया, आज उसी के लिए महानगरों में ऑक्सीजन पार्लर जैसी व्यवस्था विकसित होने लगी है। उनका कहना था कि यदि विकास की दिशा में गंभीर बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्वच्छ हवा भी आम आदमी के लिए दुर्लभ आवश्यकता बन सकती है।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद ग्रामीण भारत के प्रति एक तरह की उपेक्षा और नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ तथा यूरोप को विकास का आदर्श मानकर विकास की ऐसी अवधारणा अपनाई गई, जिसके दुष्परिणाम अब सामने दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार विश्व के अनेक शहरों में जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं और भारत के कई बड़े शहरों में वायु प्रदूषण के कारण सांस लेना तक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
मणि ने बोतलबंद पानी को भी पर्यावरणीय संकट से जोड़ते हुए कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज हवा और पानी की शुद्धता पर सवाल खड़े हैं और खाद्यान्न भी पूरी तरह प्रदूषण से अछूता नहीं है।
महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गांधी ने वर्ष 1909 में ही आधुनिक सभ्यता और विकास की दिशा को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी। उनके अनुसार विकास की ऐसी अवधारणा, जिसमें प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन समाप्त हो जाए, अंततः विनाशकारी साबित हो सकती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गोवा जैसे पर्यटन क्षेत्रों में भी वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एयर फिल्टर की जरूरत महसूस की जा रही है। यदि परिस्थितियां इसी प्रकार बिगड़ती रहीं तो भविष्य में ऑक्सीजन फिल्टर भी आम जरूरत का हिस्सा बन सकते हैं।
उत्तराखंड के विकास और पर्यटन पर चिंता
मुख्य वक्ता ने उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद विकास के लाभों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बावजूद यह विचार किया जाना जरूरी है कि विकास का वास्तविक लाभ पहाड़ के आम लोगों तक कितना पहुंच पाया है।
उन्होंने अनियंत्रित पर्यटन को उत्तराखंड के पर्वतीय शहरों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि पर्यटक नगरों पर लगातार बढ़ता दबाव वहां की पर्यावरणीय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। पहाड़ों में बाहरी क्षेत्रों के लोगों द्वारा बड़े-बड़े भवन और बंगले बनाए जाने से स्थानीय संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में समस्याएं स्थानीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई हैं और दुनिया के अनेक देश बढ़ती आबादी, संसाधनों तथा पर्यावरणीय संकट को लेकर चिंतित हैं।
झीलों और नदी घाटियों में बढ़ता खतरा
डा. महेंद्र सिंह मिराल ने स्लाइड शो के माध्यम से हिमालय की वर्तमान परिस्थितियों का विस्तृत प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के कारण वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि का हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहे प्रभावों की चर्चा की।
उन्होंने कहा कि हिमालय में भूगर्भीय हलचल और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण झीलों का बनना और बिगड़ना कोई नई प्रक्रिया नहीं है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी समझना जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से नदी घाटियों में तेजी से बसाए जा रहे नगरों और विकसित हो रहे निर्माण क्षेत्रों को भविष्य के संभावित खतरों का संकेत बताया।
उनका कहना था कि हिमालय अत्यंत संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है और यहां विकास योजनाओं को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरणीय क्षमता तथा प्राकृतिक जोखिमों को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
‘सवाल उठाना और संघर्ष करना जरूरी’
पी.सी. तिवारी ने डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट के साथ अपने लंबे जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि उनसे उन्होंने यह सीखा कि किसी भी समस्या का समाधान तलाशने के लिए सवाल उठाना और उसके लिए संघर्ष करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही समस्याओं के लिए सरकारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर लिए जाने वाले निर्णयों में स्थानीय लोगों की भागीदारी और उनके हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पहाड़ की समस्याओं पर केवल चर्चा करने के बजाय नीतिगत स्तर पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
डा. निर्मल जोशी ने नैनीताल में लगातार सामने आ रही भू-धंसाव की समस्या पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण और विकास गतिविधियों के दौरान भूगर्भीय संवेदनशीलता की अनदेखी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
अधिवक्ता जगत रौतेला ने उत्तराखंड के विभिन्न जनसंघर्षों में डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की भूमिका को याद किया। उन्होंने कहा कि बिष्ट ने हमेशा आम जनता और पहाड़ के हितों से जुड़े सवालों को प्राथमिकता दी तथा जन आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई।
‘पहाड़ के सवालों पर हमेशा संघर्षरत रहे बिष्ट’
पूर्व पालिकाध्यक्ष प्रकाश चन्द्र जोशी ने डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए कहा कि वह पहाड़ की जनसमस्याओं के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। उन्होंने कहा कि बिष्ट का जीवन आम जनता के सवालों को उठाने और उनके समाधान के लिए संघर्ष करने की प्रतिबद्धता का उदाहरण रहा है।
कार्यक्रम के दौरान अजयमित्र सिंह बिष्ट ने मुख्य वक्ताओं के जीवन एवं सामाजिक योगदान का परिचय कराया। इसके बाद अजयमित्र सिंह बिष्ट, बिशन दत्त जोशी, जंगबहादुर थापा और डॉ. वसुधा पंत ने गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली से जुड़े रमेश शर्मा, कुमार कलानंद मणि तथा डा. महेंद्र सिंह मिराल का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया।
कार्यक्रम के अंत में रेवती बिष्ट ने सभी आगंतुकों और सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की स्मृति में आयोजित ऐसे कार्यक्रम नई पीढ़ी को पहाड़, पर्यावरण और जनसरोकारों से जुड़े सवालों को समझने की प्रेरणा देते हैं।
कार्यक्रम में ब्रह्मानंद डालाकोटी, डॉ. जे.सी. दुर्गापाल, डॉ. निर्मल जोशी, आनंद सिंह बगड़वाल, मोहम्मद हारिस, सुरेंद्र बिष्ट, हेम रौतेला, शिवदत्त पांडे, राम सिंह, बसंत खनी, डॉ. हयात रावत, डॉ. देव सिंह पोखरिया, महेश परिहार, शेखर लखचौरा, कवीन्द्र पंत, भावना जोशी, विनय किरौला, आशीष जोशी, संजय पांडे, उमेश तिवारी विश्वास, भास्कर उप्रेती सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।









