27 दिव्यांग बच्चे सीख रहे हुनर
बना रहे हैं दीये-मोमबत्तियां और सजावटी सामान ; सिलाई सीखकर चला रहे बुटीक

हल्द्वानी। कुछ बच्चे बोल नहीं सकते, कुछ सुन नहीं सकते। किसी के कदम साथ नहीं देते तो किसी को मानसिक चुनौतियों से जूझना पड़ता है। जिंदगी ने इन बच्चों के सामने शुरुआत से ही ऐसी कठिनाइयां खड़ी कर दीं, जिनसे लड़ना अकेले उनके लिए आसान नहीं था। लेकिन इनकी खामोशी के पीछे सपने हैं… अपने पैरों पर खड़े होने के सपने। और इन्हीं सपनों को आकार देने का काम कर रही है ‘सेवालय’ संस्था।
फतेहपुर के निकट गांधी आश्रम क्षेत्र में संचालित यह संस्था वर्तमान में 21 बालकों और 6 बालिकाओं, यानी कुल 27 दिव्यांग बच्चों को हुनर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही है। संस्था के लिए इन बच्चों की दिव्यांगता उनकी पहचान नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपी संभावनाओं तक पहुंचने की एक चुनौती है।







हाथों ने थामा हुनर, तो बदलने लगी जिंदगी
सेवालय में बच्चों को उनकी क्षमता के अनुरूप विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां बच्चे अपने हाथों से हैंडमेड मालाएं, दीये, मोमबत्तियां, सजावटी सामग्री सहित कई तरह की वस्तुएं तैयार करते हैं।
सिर्फ इतना ही नहीं, सिलाई का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली बच्चियां बुटीक चलाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं। उद्देश्य साफ है—इन बच्चों को केवल सहारा देकर जीवन बिताने की स्थिति में रखना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा हुनर देना जिससे वे भविष्य में अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा कर सकें।
संस्था के संचालक विनोद करगेती बताते हैं कि यहां रहने वाले बच्चों की आयु लगभग 14 से 26 वर्ष के बीच है। इनमें अधिकांश बच्चे बेहद गरीब परिवारों से आते हैं। आर्थिक कठिनाइयों के साथ दिव्यांगता ने उनके परिवारों की परेशानियां और बढ़ा दी हैं। ऐसे में परिवारों ने अपने बच्चों को सेवालय को सौंपकर उनके बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी संस्था के हाथों में दी है।
किसी ने पढ़ाई फिर शुरू की, किसी ने ग्रेजुएशन तक का सफर तय किया
सेवालय केवल बच्चों को हुनर सिखाने तक सीमित नहीं है। संस्था उनके शिक्षा के अधिकार को भी उतना ही महत्व देती है।
संस्था की ओर से कुछ बच्चों को ओपन स्कूल के माध्यम से 10वीं कक्षा की पढ़ाई कराई गई है, जबकि कुछ बच्चियों को ग्रेजुएशन तक की शिक्षा दिलाने का प्रयास किया गया है।
विनोद करगेती के अनुसार, यहां रहने वाले अधिकांश बच्चे बोलने और सुनने में सक्षम नहीं हैं। कुछ बच्चे मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जबकि कुछ को चलने-फिरने में परेशानी है। इसके बावजूद उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें उसी के अनुरूप प्रशिक्षण देने का प्रयास किया जा रहा है।
किसी का घर नहीं रहा… किसी का सहारा नहीं रहा
इन बच्चों की कहानियां केवल दिव्यांगता की कहानी नहीं हैं। इनके पीछे गरीबी, मजबूरी और परिवारों के संघर्ष की भी लंबी दास्तान है।
सेवालय में आने वाले कई बच्चों को उनके परिजन स्वयं संस्था के हवाले करके गए हैं। कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो पूरी तरह अनाथ हैं और उनके माता-पिता इस दुनिया में नहीं हैं। कई बच्चों के सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका है।
ऐसे परिवार, जो आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं कि अपने बच्चों की शिक्षा, आवास, भोजन और प्रशिक्षण का खर्च उठा सकें, उन्होंने उम्मीद के साथ अपने बच्चों की जिम्मेदारी सेवालय को सौंपी है।
संस्था इस जिम्मेदारी को केवल एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी मानकर निभा रही है।
नंदपुर के किराये के भवन में बना है इनका घर
इन बच्चों के रहने की व्यवस्था नंदपुर स्थित किराये के भवन में की गई है। यही उनका घर है, जहां उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था संस्था की ओर से की जाती है।
बच्चे अलग-अलग समय पर सेवालय से जुड़े हैं। विनोद करगेती के मुताबिक, यहां रहने वाले लड़कों को लगभग दो वर्ष होने वाले हैं, जबकि लड़कियों को संस्था के साथ रहते करीब एक वर्ष पूरा हो चुका है।
इन बच्चों के परिवारों से संस्था का संपर्क बना रहता है। परिजन समय-समय पर अपने बच्चों से मिलने भी आते हैं।
पहाड़ के दूर-दराज इलाकों से पहुंच रहे बच्चे
सेवालय से जुड़े अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से हैं। इनमें बड़ी संख्या पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाले बच्चों की है।
बागेश्वर, चंपावत, रानीखेत और अल्मोड़ा के अलावा काशीपुर, रामनगर, बिजनौर और जसपुर क्षेत्र से भी बच्चे यहां पहुंचे हैं।
दूर-दराज के गांवों और कस्बों से आए इन बच्चों के लिए सेवालय सिर्फ प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान बन गया है जहां उन्हें अपनापन, शिक्षा, रहने का सहारा और भविष्य के लिए हुनर मिल रहा है।
सरकारी मदद नहीं, लोगों के भरोसे चल रही उम्मीद
इतने बड़े दायित्व के बावजूद संस्था को सरकारी स्तर पर कोई सहयोग नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, भोजन, आवास और प्रशिक्षण सहित अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संस्था मुख्य रूप से आम जनसमुदाय के सकारात्मक सहयोग पर निर्भर है।
विनोद करगेती कहते हैं कि इन बच्चों को किसी पर बोझ नहीं बनाना, बल्कि उन्हें ऐसा सक्षम बनाना है कि वे आगे चलकर अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद उठा सकें।
शायद यही सेवालय की सबसे बड़ी कोशिश है—दया नहीं, अवसर देना। सहानुभूति नहीं, हुनर देना। और सहारे के बजाय आत्मनिर्भरता की राह दिखाना।
इन बच्चों के हाथों से बनती एक छोटी-सी मोमबत्ती या मिट्टी का एक दीया सिर्फ एक वस्तु नहीं है। उसके पीछे किसी बच्चे की मेहनत, किसी परिवार की उम्मीद और एक बेहतर भविष्य का सपना जुड़ा है।
आप भी बन सकते हैं इन बच्चों की उम्मीद
यदि कोई व्यक्ति इन बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण, भोजन, आवास या उनके द्वारा तैयार उत्पादों के माध्यम से सहयोग करना चाहता है, तो वह फतेहपुर के निकट गांधी आश्रम स्थित सेवालय संस्था से संपर्क कर सकता है।
क्योंकि कभी-कभी किसी की जिंदगी बदलने के लिए बहुत बड़ी मदद की जरूरत नहीं होती—बस किसी के हुनर पर भरोसा करने और उसे एक मौका देने की जरूरत होती है।


