अल्मोड़ा सत्र न्यायालय ने पलटा निचली अदालत का निर्णय
दोनों आरोपियों को किया बरी
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। महज 500 मीटर दूर स्थित पुलिस चौकी में घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने में पांच घंटे की देरी क्यों हुई, इसका संतोषजनक जवाब अभियोजन पक्ष नहीं दे सका। यही सवाल अल्मोड़ा के सत्र न्यायालय में पूरे मामले का सबसे अहम बिंदु बन गया। गवाहों के विरोधाभासी बयान, मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस की कार्रवाई में सामने आए गंभीर अंतर के आधार पर सत्र न्यायाधीश श्रीकान्त पाण्डेय ने निचली अदालत का दोषसिद्धि का आदेश पलटते हुए दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता पीसी तिवारी और मनोज कुमार पंत ने बताया कि मामला 15 दिसंबर 2022 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार राजस्व उप निरीक्षक क्षेत्र कोटुली के अंतर्गत मिरतोला स्थित एक चाय की दुकान पर केदार सिंह बिष्ट चाय पी रहे थे। आरोप था कि इसी दौरान कमल सिंह राणा और राजेन्द्र सिंह बिष्ट वहां पहुंचे और उनके साथ गाली-गलौज करते हुए मारपीट कर दी। यह भी दावा किया गया कि आरोपियों ने कुर्सी से हमला कर उनके हाथ में चोट पहुंचाई तथा जान से मारने की धमकी दी।

इस मामले में निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपियों की ओर से सत्र न्यायालय में अपील दायर की गई, जहां मामले की दोबारा सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पुलिस जांच और एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि घटना स्थल से पुलिस चौकी की दूरी मात्र 500 मीटर थी, इसके बावजूद प्राथमिकी दर्ज कराने में करीब पांच घंटे की देरी हुई। अभियोजन पक्ष इस देरी का कोई ठोस और विश्वसनीय कारण अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सका।
सत्र न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए। वादी और उसके पिता के बयानों में भी पर्याप्त अंतर पाया गया। इतना ही नहीं, मेडिकल रिपोर्ट और मौखिक गवाही के बीच भी सामंजस्य नहीं मिला, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी संदेह के घेरे में आ गई।
अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और मामले में अभियोजन की कहानी विश्वसनीय नहीं ठहरती।
इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद सत्र न्यायाधीश श्रीकान्त पाण्डेय ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला निरस्त कर दिया तथा कमल सिंह राणा और राजेन्द्र सिंह बिष्ट को सभी आरोपों से बरी करने के आदेश जारी किए। यह फैसला आपराधिक मामलों में निष्पक्ष जांच, समय पर प्राथमिकी दर्ज करने और साक्ष्यों की विश्वसनीयता के महत्व को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।


