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हल्द्वानी न्यूज : राजाजी पार्क में गुर्जरों के उत्पीड़न के खिलाफ राज्यपाल को माले ने ज्ञापन भेजा

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हल्द्वानी । वन विभाग द्वारा राजाजी नेशनल पार्क में गुर्जरों के साथ की जा रही ज्यादती और उत्पीड़न के खिलाफ भाकपा (माले) राज्य सचिव राजा बहुगुणा और अखिल भारतीय किसान महासभा के जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह जंगी द्वारा उत्तराखंड के राज्यपाल को एसडीएम हल्द्वानी के मध्यम से पांच सूत्रीय ज्ञापन भेजा गया। ज्ञापन में कहा गया है कि 16 जून की शाम लगभग चार बजे वन विभाग के कर्मचारी परशुराम,सीमा पैन्यूली , अमृता डंगवाल, अमर थापा, आन सिंह,राजेंद्र, गुलाम रसूल आदि नूरजहां पुत्री गुलाम मुस्तफा के देहरादून के आशा रोड़ी, निकट डाक बंगला, रामगड़ रेंज, के डेरे पर अचानक पहुंच गए और उन्होंने नूरजहां का डेरा तोड़ने का प्रयास किया। नूरजहां द्वारा इस संबंध में वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत भरे गए दावों का तथा उच्च न्यायलय नैनीताल के द्वारा उनके पक्ष में दिए गए निर्णय का हवाला भी दिया गया परन्तु वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा इन्हें मानने से इंकार कर दिया गया और उन्होंने नूरजहां के साथ मारपीट आरंभ कर दी । वन कर्मचारियों ने इस दौरान नूरजहां के कपड़े फाड़ डाले तथा डंडो से उसकी पिटाई की। इतना ही नहीं उन्होंने नूरजहां को जमीन पर घसीटा तथा कहा कि हम वन अधिकार अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट को नहीं जानते तुम्हें यह जगह छोड़नी होगी।

शोरगुल होने पर गांव वाले उपरोक्त स्थल पर पहुंचे । गांव वालों के आने पर वन विभाग वाले यह धमकी देते हुए चले गए कि कल वह पूरी फोर्स के साथ आएंगे और तब देखेंगे कि नूरजहां डेरा कैसे खाली नहीं करती है ।

इसके उपरांत गांव वालों ने नूरजहाँ को अस्पताल पहुंचाया जहां उसका इलाज किया गया। नूरजहां के इलाज की मेडिकल रिपोर्ट संलग्न है।अगले दिन दिनांक 17- 6-2020 को वन विभाग के लगभग 40 कर्मचारी जो की लाठी डंडों, के साथ वर्दी में थे, नूरजहां के डेरे पर आए तथा उन्होंने नूरजहां के साथ मारपीट आरंभ कर दी ।वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत गठित वन अधिकार समिति के अध्यक्ष गुलाम मुस्तफा द्वारा वन विभाग के कर्मचारियों को वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत भरे हुए दावों को दिखाया गया परंतु उन्होंने इन दावों को मानने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिनांक 28 मार्च 2019 को दिए गए स्थगन आदेश की प्रति भी वन विभाग के अधिकारियों को दिखाई गई परंतु उन्होंने इस आदेश को भी मानने से इनकार कर दिया ।

वन विभाग के कर्मचारियों, ने पूरे गांव वालों को घेर लिया और लाठी-डंडों से ग्रामीणों की पूरी तरह से पिटाई की। नूरजहां की बहुत ज्यादा पिटाई की गई। जिसके कारण वह बेहोश हो गई।

वन विभाग के अधिकारियों को यह लगा कि शायद नूरजहां की मृत्यु हो गई है जिस कारण वह मौके से वापस लौट गए। गांव वालों ने नूरजहां तथा रमजान बीबी को 100 नंबर पर एंबुलेंस बुलाकर अस्पताल पहुंचाया जहां उनका इलाज किया गया।

इस दौरान वन विभाग के अधिकारियों ने साजिश रचकर गांव वालों के खिलाफ थाने में झूठी एफ.आई.आर दर्ज करा दी तथा पुलिस ने वगैर सत्यता की जाँच किए ही 18 जून की सुबह गांव से निर्दोष महिलाओं,नाबालिग बच्चों और 80 वर्षीय वृद्ध मुस्तफा को गिरफ्तार करके क्लेमेंटन टाउन थाने में रख दिया ।
17 जून के पूरे दिन इन लोगो को गैर कानूनी तरीके से थाने में ही रखा गया तथा कोर्ट में पेश नहीं किया गया। थाने में भी गुलाम मुस्तफा और अन्य महिलाओं को, विशेषकर नूरजहाँ को बहुत पीटा गया, उसके private पार्ट पर मुक्कों से प्रहार किया गया।
नूरजहाँ शर्म के कारण किसी को ये बता नहीं पाई। बाद में मिलने के लिए आई एक रिस्तेदार महिला को उसने ये सब-कुछ बताया।

कोर्ट में पेशी के दौरान मुस्तफा को आई चोट के फोटो लिए गए।

गिरफ्तार किये गये सभी लोगों का पुलिस द्वारा गलत तरीके, से मेडिकल कराया गया और मेडिकल में सबको फिट दिखला दिया गया।

नूरजहां के खिलाफ की गई मारपीट के संबंध में संबंधित थाने में एफ.आई.आर दी गई गई थी परन्तु थाने ने इसे लेने से इनकार कर दिया । वन विभाग के कर्मचारियों एवं पुलिस के द्वारा उपरोक्त घटना में संसद, सर्वोच्च और उच्च न्यायलय की अवमानना के साथ मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन किया गया है।

गिरफ्तार किए गए वन गुजर अत्यंत गरीब हैं और शिक्षित भी नहीं है। इस कारण अपनी पैरवी करने में भी सक्षम नहीं हैं।
वन मंत्री उत्तराखंड ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस घटना की जाँच के आदेश दिए हैं।

अब ज्ञापन में मांग की गई है कि नूरजहाँ द्वारा दी गई प्रथम सूचना रिपोर्ट को दर्ज किया जाए तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
सभी गिरफ्तार लोगों को बिना शर्त रिहा किया जाये तथा वन विभाग द्वारा ग्रामीणों पर दर्ज किए गए फर्जी मुकदमे को तत्काल वापस किया जाए।

17-06-2020 को आसा रोड़ी में वन विभाग की गयी दमनात्मक कार्यवाही में शामिल सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त कर उन पर कड़ी कानूनी कार्यवाही की जाए।

राजाजी पार्क के निदेशक द्वारा समाचार पत्रों को दिए गए गैर कानूनी बयान की जांच करवाई जाए, जिसमे उन्होंने राजाजी पार्क से सभी लोगों को अतिक्रमणकारी मानते हुए हटाने की बात कही है।

वन अधिकार कानून, 2006 के अंतर्गत प्रस्तुत दावों को तत्काल निबटाने का आदेश राज्य सरकार को दिया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

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