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Almora Special: दो दशक पार, बजट की भरमार और दो सौ से अधिक स्कूलों को नमस्कार!

— अल्मोड़ा जनपद में मिडिल व प्राइमरी शिक्षा के हालात
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा
उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद दो दशक पार हुए और इन दो दशकों में शिक्षा के नाम पर योजनाओं व कार्यक्रमों की भरमार रही। सरकारी स्कूलों से बच्चों व अभिभावकों का मोह जगाने के​ लिए तरह—तरह के दावे हुए, मगर हश्र ये है कि ऐतिहासिक जनपद अल्मोड़ा में इन दो दशकों में 207 जूनियर हाईस्कूल व प्राथमिक विद्यालय आबाद होने के बजाय बंद हो गए। ये हालात शिक्षा व्यवस्था व तमाम दावों पर तमाचा खींचते हैं।
राज्य गठन के बाद अब तक आई हर सरकार ने शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, बेहतर शिक्षा, विद्यालयों को सुविधाओं को लैस करने के तमाम दावे किए, बकायदा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूलों में नौनिहालों की संख्या बढ़ाने के लिए विविध योजनाएं व कार्यक्रम संचालित किए और उनके नाम पर करोड़ों का बजट बहाया। दावे शिक्षा व्यवस्था पर चार चांद लगाने वाले हैं। कुछ जगहों सुधार भी देखा गया, किंतु पूरे प्रदेश में सरकारी विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्थाओं, योजनाओं व कार्यक्रमों पर सवालिया निशान खड़े करने वाले सैकड़ों उदाहरण हैं। अकेले अल्मोड़ा जिले की बात करें, तो सरकारी स्कूलों से मोहभंग के तमाम उदाहरण हैं। सवाल यह है कि इनती योजनाएं, कार्यक्रमों व बजट के बावजूद बच्चों की सरकारी मिडिल व प्राथमिक विद्यालयों से दूरी क्यों बढ़ी।

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गौरतलब है कि जब उत्तराखंड राज्य बना, तो अल्मोड़ा जिले में मिडिल व प्राइमरी स्कूलों की संख्या 1470 थी, जो दो दशक बाद बढ़ने के बावजूद घट गई और अब यह संख्या 1263 रह गई है यानी दो दशक में 207 मिडिल व प्राइमरी स्कूल बंद हो गए। इसकी वजह छात्र संख्या न्यून हो जाना बताया गया है और छात्र संख्या में कमी की वजह पठन—पाठन की कमजोरी व संसाधनों का अभाव माना जा रहा है। हालांकि शिक्षाधिकारियों का कहना है कि छात्रसंख्या शून्य होने से ये विद्यालय बंद हुए। साथ ही वह यह भी कहते हैं कि शासन द्वारा छात्र हित में तमाम कल्याणकारी योजनाएं संचालित हैं और स्कूलों में संसाधनों की कमी दूर करने और शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने के हरसंभव प्रयास चल रहे हैं।

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