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इस गांव में क्या हिंदू, क्या मुसलमान ! हर कोई घर जमाई, महिलाओं का पूर्ण आधिपत्य

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष (International Women’s Day special)

Creative News Express (CNE) Reporter

Women’s empowerment : Village in India, where complete dominance of women.

महिला सशक्तिकरण की यदि बात करें तो भारत का एक गांव ऐसा है, जहां वास्तव में महिलाओं का पूर्ण आधिपत्य है। खास बात यह है कि हिंदू हो या मुसलमान हर कोई यहां घर जमाई बनकर रहता है। यहां लड़के अगर बहू लेकर आते हैं तो बेटियां भी बेटै लेकर आया करती हैं। यानी यहां रहने वाली लड़कियां आजन्म अपने मायके में ही रहती है और जब उसकी शादी होती है तो वह ब्याह कर जाती नहीं, बल्कि ब्याह कर अपने साथ घर जमाई को लाती हैं।

हम यहां बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के कौशांबी अंतर्गत करारीनगर के गांव पुरवा की। इसे लोग दामादों के गांव के रूप में भी जानते हैं। शादी के बाद पतियों के गांव में बसने की परंपरा सदियों पुरानी है। यहां बेटियां बेटे ब्याह कर लाती हैं। हर परिवार में घर जमाई होते हैं और उन्हें कोई इसके लिए लानत नहीं देता, क्योंकि यह इस गांव की प्राचीन परंपरा है।

बताते चलें, कि गांव में रहने वाले अधिकांश मर्द यहां बाहरी गांवों से आये हैं और इसी गांव के वाशिंदे होकर रह गये हैं। शादी के बाद मर्द यहां डेरा जमा लेते हैं। यहां महिलाओं का अधिकार पुरूष से बराबरी का या अधिक ही होता है। अधिक अधिकार इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि देश भर में जहां लड़कियां शादी के बाद अपने ससुराल जाती हैं तो वहां कहीं न कहीं उन्हें दबना पड़ता है, लेकिन इस गांव में वह अपने माता—पिता व भाई—बहनों के साथ राज करती है। हां, लड़के जरूर दूसरे गांव से आते हैं और नई जगह पहुंचने पर नई—नई शादी में लड़कियों की तरह शर्माया करते हैं और कुछ समय संकोच में रहते हैं।

गांव में महिला व पुरूष

गृहस्थी चलाने में महिला—पुरूष यहां मिलकर काम किया करते हैं। यहां अधिकांश घरों में बीड़ी बनाने का काम होता है, जिसमें पति—पत्नी बराबर श्रम करते हैं। यहां आकर देखेंगे तो पायेंगे कि 25 साल से 70 साल तक के बुजुर्ग घर जमाई यहां रहा करते हैं। इस गांव की एक खासियत और है कि यहां बेटियों को बेटों के बराबर एजुकेशन व अन्य सुविधा दी जाती है। कोई भी परिवार बेटा—बेटी में भेदभाव नहीं करता। गांव की लड़कियां प्रत्येक कार्य करती हैं, जो लड़के किया गरते हैं। इन पर कोई पाबंदी नहीं लगाता है।

यहां रहने वाली यासमीन बेगम के निकाह को 20 साल हो गये हैं। उन्होंने कहा कि ससुराल में कितनी भी आजादी हो, लेकिन कुछ न कुछ बंधन तो जरूर रहते हैं। गांव में पति के साथ रहते हुए वह अपनी मर्जी से रोजगार भी कर पा रही हैं। फतेहपुर के रहने वाले फिरदौस अहमद बताते हैं कि 22 साल पहले यहां की बेटी से शादी करने के बाद वह यहीं के होकर रह गए। फिरदौस की ही तरह सब्बर हुसैन ने भी अपनी पत्नी के मायके में आकर ही बस गये हैं। उनका कहना है कि इस गांव में तमाम वह सुविधाएं हैं, जो इंसान को गुजर—बसर के लिए चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने यहां आकर घर जमाई बनना स्वीकार कर लिया था।

यहीं नहीं, यहां तो कुछ परिवार तो ऐसे भी हैं, जहां ससुर भी यहां घर जमाई बनकर आए थे। गांव के संतोष कुमार बताते हैं कि उसके ससुर रामखेलावन ने गांव की बेटी प्यारी हेला के साथ शादी कर ली। उसके बाद यहां रहने लगे। वह भी उनकी बेटी चंपा हेला के साथ शादी के बाद गांव में बस गए थे। इधर सभासद यशवंत यादव ने कहा कि महिला और पुरुषों को यहां बराबरी का दर्जा है, कोई छोटा—बड़ा नहीं है। यही कारण है कि यहां पति—पत्नी में झगड़े बहुत कम होते हैं।

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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