जानिए, बिस्सू पर्व और थोड़ा खेल क्यों हैं खास ?
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग और आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (सीका) द्वारा गुरुवार को विशेष व्याख्यान एवं डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की मुख्य वक्ता विख्यात नृविज्ञानी व शोधकर्ता प्रो. अंजली चौहान रहीं।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि जौनसार क्षेत्र के पारंपरिक उत्सव और खेल, जैसे बिस्सू पर्व और थोड़ा (The Game of the Warriors), सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि समाज की जीवनशैली, कृषि परंपरा और सामाजिक संरचना को समझने का माध्यम हैं।
बिस्सू पर्व: संस्कृति और फसल उत्सव का संगम
प्रो. चौहान ने बताया कि बिस्सू पर्व बैसाखी के समय पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह न केवल फसल उत्सव है बल्कि इसमें स्थानीय रीति-रिवाज, पारंपरिक भोजन और औपचारिक समारोह शामिल होते हैं, जो क्षेत्रीय संस्कृति के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं।
आधुनिक चुनौतियां और संरक्षण की आवश्यकता
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, शहरी दबाव और पर्यटन के चलते इन परंपराओं का डिजिटल दस्तावेजीकरण और संरक्षण बेहद जरूरी है। साथ ही स्थानीय कला, वास्तुकला और सामाजिक प्रथाओं को एथनो-टूरिज्म के माध्यम से बढ़ावा देने पर भी बल दिया।
कुलपति और प्राध्यापकों के विचार
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि भारत और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता को छात्रों तक पहुंचाना और पाठ्यक्रम में शामिल करना विश्वविद्यालय की प्राथमिकता है।
वहीं, इतिहास विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. गिरिजा प्रसाद पांडे ने कहा कि पाठ्यक्रम में स्थानीय समाज और संस्कृति का समावेश छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।
डॉक्यूमेंट्री में दिखी जौनसार की झलक
इस अवसर पर प्रस्तुत डॉक्यूमेंट्री में थोड़ा खेल और बिस्सू पर्व के साथ-साथ कालसी और चकराता क्षेत्र के सांस्कृतिक जीवन को प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय परिवार के कई प्राध्यापक व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे, जिनमें प्रो. रेनू प्रकाश, राकेश रायाल, प्रो. शशांक शुक्ला, प्रो. मंजरी अग्रवाल, डॉ. लता जोशी, डॉ. आरुषि, डॉ. भाग्यश्री जोशी और डॉ. भूपेन सिंह शामिल रहे.

