HomeUttarakhandAlmoraकोहरे में सिमटी ज़िन्दगी: विकास की अंधी दौड़ और दम घुटता पर्यावरण

कोहरे में सिमटी ज़िन्दगी: विकास की अंधी दौड़ और दम घुटता पर्यावरण

ADVERTISEMENTS
  • अल्मोड़ा से अनूप साह

उत्तर भारत में सर्दियों की दस्तक के साथ ही कोहरे की घनी चादर ने जनजीवन को अपनी आगोश में लेना शुरू कर दिया है। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है। आज कोहरा सिर्फ दृश्यता (visibility) कम नहीं कर रहा, बल्कि इंसानों से लेकर जीव-जंतुओं तक, हर जीवित इकाई के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। जहाँ बुजुर्गों का घर से निकलना दूभर है, वहीं जहरीली हवा ने आम आदमी का सांस लेना भी मुश्किल कर दिया है।

AQI के आंकड़े और हमारी सेहत

आजकल वायु की गुणवत्ता मापने के लिए AQI (Air Quality Index) का सहारा लिया जाता है। शून्य से 200 तक का सूचकांक संतोषजनक माना जाता है, लेकिन इससे ऊपर जाते ही हवा ‘खतरनाक’ श्रेणी में आ जाती है।

दिलचस्प बात यह है कि जब तकनीक नहीं थी, तब लोग अपनी आंखों की जलन और नाक की संवेदनशीलता से हवा की शुद्धता भांप लेते थे। आज हम आंकड़ों में उलझे हैं, जबकि हकीकत यह है कि शुद्ध हवा अब एक विलासिता (luxury) बनती जा रही है।

हमारी विरासत: प्रकृति पूजा और पर्यावरण संरक्षण

हमारे पूर्वज पर्यावरण के प्रति आज की पीढ़ी से कहीं अधिक जागरूक थे। भारतीय संस्कृति में पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) की पूजा का विधान इसी जागरूकता का प्रमाण है।

  • जीव-जंतुओं का संरक्षण: हिंदू धर्म में देवताओं को पशु-पक्षियों से जोड़कर उनके संरक्षण का संदेश दिया गया।
  • वृक्षों की महत्ता: पीपल, बरगद और तुलसी जैसे वृक्षों की पूजा के पीछे मूल भावना उन्हें कटने से बचाना और ऑक्सीजन के चक्र को बनाए रखना था।
  • ऐतिहासिक आंदोलन: 1973 में उत्तराखंड के चमोली से शुरू हुआ गौरा देवी का ‘चिपको आंदोलन’ आज भी विश्व के लिए प्रेरणा है।

प्रदूषण के असली कारण: पराली और पटाखे ही नहीं!

अक्सर कोहरे और स्मॉग का दोष पराली जलाने या दिवाली के पटाखों पर मढ़ दिया जाता है। लेकिन आज जब ये दोनों कारण बीत चुके हैं, तब भी कोहरा और प्रदूषण बरकरार है। इसका मूल कारण है अनियोजित विकास।

  1. वृक्षों की अंधाधुंध कटाई: 40-50 साल पहले घने जंगल कोहरे को सोख लेते थे और समय पर वर्षा सुनिश्चित करते थे।
  2. शहरीकरण का दबाव: फैक्ट्रियों और कार्यालयों का एक ही स्थान पर संकेंद्रण (Centralization) होने से वाहनों और भीड़ का दबाव बढ़ता है, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण का संकट गहरा जाता है।
  3. तकनीक का अभाव: पुरानी तकनीक वाली फैक्ट्रियां और धुआं छोड़ते वाहन आज भी पर्यावरण के सबसे बड़े दुश्मन बने हुए हैं।

संरक्षण के अनूठे प्रयास: मैती आंदोलन से ‘एक पेड़ माँ के नाम’ तक

पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ व्यक्तिगत और सरकारी प्रयास उम्मीद जगाते हैं:

  • मैती आंदोलन: 1995 में उत्तराखंड के ग्वालदम से शुरू हुई यह परंपरा, जिसमें विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन वृक्षारोपण करते हैं, पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है।
  • एक पेड़ माँ के नाम: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह अभियान आने वाली पीढ़ियों में वृक्षों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और जिम्मेदारी पैदा करने में सहायक होगा।

समाधान और हमारी जिम्मेदारी

प्रकृति की अपनी एक सीमा है और हम उस सीमा को लांघ चुके हैं। भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हमें निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  • नदी-नालों और जलाशयों के पास सघन वृक्षारोपण किया जाए।
  • कार्यालयों और उद्योगों का विकेंद्रीकरण किया जाए ताकि एक ही शहर पर बोझ न बढ़े।
  • प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों और फैक्ट्रियों पर सख्त लगाम कसी जाए और उन्हें आधुनिक तकनीक से लैस किया जाए।

निष्कर्ष विकास की दौड़ में हमने पर्यावरण को हाशिये पर धकेल दिया है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी एक स्वस्थ और सुखमय जीवन जिए, तो हमें अपनी जीवनशैली और विकास के मॉडल को बदलना होगा। याद रखें, प्रकृति के बिना प्रगति संभव नहीं है।

ADVERTISEMENTS
🔴 BREAKING: खनन कारोबारी का खौफनाक गुस्सा! रेट विवाद में प्रतिद्वंद्वी का क्या हाल किया? (देखें वीडियो)
Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
RELATED ARTICLES

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments