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हरीश रावत का ‘सियासी अवकाश’: रणनीति या मजबूरी?

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आखिर क्यों अपनों के ही निशाने पर हैं पूर्व मुख्यमंत्री?

उत्तराखंड कांग्रेस की अंतर्कलह और 2027 की चुनौतियों का विश्लेषण

  • रमेश जड़ौत

उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे कद्दावर और अनुभवी चेहरे, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का वर्तमान में ‘अचानक राजनीतिक अवकाश’ पर चले जाना प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। वर्ष 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, कांग्रेस लगातार विभिन्न राजनीतिक हस्तियों को पार्टी में शामिल कर अपना कुनबा बढ़ाने में जुटी है। इसी क्रम में, मार्च माह की 28 तारीख को दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल, भीमलाल आर्य, गौरव गोयल, लाखन सिंह और अनुज गुप्ता जैसे नेताओं ने कांग्रेस का दामन थामा।

हैरानी की बात यह रही कि इस कार्यक्रम में स्वयं मौजूद रहने के बावजूद, हरीश रावत अचानक बीच में ही उठकर चले गए और इसके तुरंत बाद उन्होंने 15 दिनों के ‘राजनीतिक अवकाश’ की घोषणा कर दी।

इतिहास की पुनरावृत्ति: कोपभवन और नाराजगी

यह पहली बार नहीं है जब रावत ने इस तरह का कदम उठाया है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 2012 में जब विजय बहुगुणा को उनकी जगह मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई थी, तब भी रावत रुष्ट होकर ‘कोपभवन’ (एकांतवास) में चले गए थे। हालाँकि, इस बार की नाराजगी की वजह सत्ता या पद न होकर, अपनी पसंद के कार्यकर्ताओं को पार्टी में उचित स्थान न दिला पाना है। हाल ही में एक टीवी चैनल पर स्वयं राजनेता संजय नेगी ने खुलासा किया कि रावत की इस घोषणा के पीछे असल कारण क्या है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हरीश रावत कांग्रेस के सर्वाधिक वरिष्ठ नेता हैं और छह दशकों से राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी रहे हैं। 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़े गए। लेकिन 2017 और 2022 की ‘मोदी लहर’ ने कांग्रेस को जो शिकस्त दी, उसका खामियाजा रावत को अपनों के विरोध के रूप में भुगतना पड़ा। उनके सबसे करीबी सिपहसालार और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानने वाले रणजीत सिंह रावत भी आज उनके खिलाफ खड़े हैं।

हरीश रावत
Harish Rawat

रामनगर सीट: विवाद की असली जड़

रावत के हालिया अवकाश की मुख्य वजह रामनगर विधानसभा सीट और संजय नेगी की पार्टी में वापसी को माना जा रहा है। हरीश रावत चाहते हैं कि पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी की घर वापसी हो, परंतु पूर्व सांसद महेंद्र पाल के नेतृत्व वाला गुट इसका कड़ा विरोध कर रहा है।

विरोध का आधार:

  • वर्ष 2022 में संजय नेगी ने कांग्रेस में रहते हुए भी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार रणजीत सिंह रावत के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था।
  • इस कारण कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें निष्कासित कर दिया था, जो आज भी प्रभावी है।
  • संजय नेगी के निर्दलीय चुनाव लड़ने के कारण ही कांग्रेस को रामनगर की सुरक्षित मानी जाने वाली सीट गँवानी पड़ी थी।

अब 2027 की चुनावी बिसात बिछने से पहले रामनगर सीट फिर से राजनीतिक केंद्र बन गई है। रणजीत सिंह रावत, जो पहले भी यहाँ से चुनाव लड़ चुके हैं, एक बार फिर यहाँ से दावेदारी की तैयारी में हैं। यदि संजय नेगी की वापसी होती है, तो वे स्वाभाविक तौर पर टिकट मांगेंगे, जिससे रणजीत सिंह रावत की स्थिति असहज हो जाएगी। गौरतलब है कि पिछली बार कांग्रेस के पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र सिंह पाल की हार का प्रमुख कारण भी पार्टी के भीतर की यही बगावत मानी गई थी।

पार्टी के भीतर बंटे सुर

रावत के इस फैसले पर कांग्रेस के भीतर भी विरोधाभास साफ दिख रहा है। वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह कुंजवाल कहते हैं कि “हरीश रावत के बिना उत्तराखंड में कांग्रेस की कल्पना भी असंभव है।” इसके विपरीत, पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि “किसी को यह मुगालता या अहंकार नहीं पालना चाहिए कि उसके बिना पार्टी नहीं जीत सकती। संगठन व्यक्ति से हमेशा ऊपर होता है।”

दूसरी ओर, धारचूला विधायक हरीश धामी रावत के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं और उन्होंने यहाँ तक कह दिया है कि रावत के सम्मान में वे सामूहिक इस्तीफे की अपील करेंगे।

विपक्ष की चुटकियाँ और रणनीतिक चूक

कांग्रेस की इस अंतर्कलह पर भाजपा मजे लेने से पीछे नहीं हट रही है। रणजीत सिंह रावत ने अपने गुरु के ‘अवकाश’ की तुलना ‘उपवास’ से करते हुए तंज कसा कि उपवास स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कयास लगाया है कि जितने लोग आए नहीं, उससे ज्यादा लोग कांग्रेस छोड़ देंगे।

हालाँकि, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल इस मामले को ‘गैर-जरूरी’ बताते हुए कहते हैं कि रावत की मंशा पर हाईकमान विचार करेगा और जल्द समाधान निकलेगा। वहीं हरक सिंह रावत ने कुमारी शैलजा के हवाले से स्पष्ट किया है कि संजय नेगी सहित अन्य नामों पर विचार-विमर्श दूसरे चरण में किया जाएगा।

निष्कर्ष: दबाव की राजनीति या अपनों की उपेक्षा?

साठ वर्षों के बेदाग राजनीतिक सफर में हरीश रावत ने ब्लॉक प्रमुख से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया है। आज उनका पूरा परिवार—पत्नी, पुत्र और पुत्रियां—सक्रिय राजनीति में हैं। ऐसे में किसी एक व्यक्ति (संजय नेगी) के लिए सार्वजनिक रूप से हठधर्मिता दिखाना रावत के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।

जानकारों का मानना है कि यह ‘अवकाश’ आलाकमान पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। लेकिन इस रणनीति के सार्वजनिक होने से कांग्रेस की आंतरिक फूट उजागर हुई है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्ष 2012 की उनकी नाराजगी जायज थी क्योंकि तब जनता और कार्यकर्ता उनके साथ थे, लेकिन आज पार्टी का एक बड़ा धड़ा रावत-केंद्रित राजनीति को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा है।

जब भाजपा अपनी नीतियों की विफलताओं के कारण रक्षात्मक मुद्रा में है, ऐसे समय में हरीश रावत जैसे गंभीर और अनुभवी नेता का सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताना और विपक्षी मंत्रियों (जैसे खजानदास) से मिलना, कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। रावत ने अनजाने में भाजपा को बैठे-बिठाए आलोचना का एक बड़ा मुद्दा दे दिया है।

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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