एक पिता की बेबसी और गरिमापूर्ण मृत्यु की जीत—हरीश अब यादों में जीवित रहेंगे
सीएनई रिपोर्टर, दिल्ली | मंगलवार की वह सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर आम दिनों की तरह नहीं थी। वहाँ हवाओं में भारीपन था और आँखों में नमी। 13 वर्षों तक बिस्तर पर पत्थर बन चुके शरीर और कोमा की गहरी खामोशी को ओढ़े हरीश राणा आज अपनी अंतिम यात्रा पर थे। 31 साल के उस नौजवान का अंतिम संस्कार हुआ, जिसने अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा सिर्फ सांसें गिनते हुए बिता दिया।
दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में बुधवार सुबह 9.40 बजे छोटे भाई आशीष राणा ने मुखाग्नि दी।
“बेटा शांति से जाए…”: एक पिता का कलेजा और हाथ जोड़ती प्रार्थना
श्मशान घाट का दृश्य रूह कंपा देने वाला था। जब सुबह 8:30 बजे हरीश का पार्थिव शरीर लाया गया, तो उनके पिता अशोक राणा का धैर्य देखकर पत्थर भी पिघल जाए। उन्होंने अपने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और वहाँ मौजूद रोते हुए लोगों के सामने हाथ जोड़कर बस इतना कहा:
“कोई रोना मत… मैं प्रार्थना कर रहा हूँ कि मेरा बेटा अब शांति से जाए। अब वह जहाँ भी जन्म ले, उसे भगवान का आशीर्वाद मिले और उसे ऐसा कष्ट दोबारा न भोगना पड़े।”
अपने जवान बेटे को कंधा देते हुए पिता की उन कांपती आवाजों ने ‘इच्छामृत्यु’ जैसे कानूनी शब्दों को एक मानवीय पीड़ा के रूप में जीवंत कर दिया।
न्याय की चौखट से मौत के आगोश तक
हरीश राणा का मामला भारत के कानूनी इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह महज एक मौत नहीं, बल्कि ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ की जीत है।
- 13 साल का इंतजार: 2011 में एक हादसे के बाद हरीश कोमा में चले गए थे। तब से उनका परिवार उन्हें ठीक करने की आस और उनकी तकलीफ देखने की बेबसी के बीच झूल रहा था।
- ऐतिहासिक फैसला: 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी। यह देश का संभवतः पहला ऐसा मामला बना जहाँ इस प्रक्रिया को इतने स्पष्ट रूप से अपनाया गया।
- महाप्रयाण: 24 मार्च की शाम 4:10 बजे एम्स (AIIMS) में जब लाइफ सपोर्ट हटाया गया, तो हरीश ने अपनी आखिरी प्राकृतिक सांस ली और उस कैद से आजाद हो गए जिसे दुनिया ‘जिंदगी’ कह रही थी।
जाते-जाते दे गए दूसरों को ‘नजर’ और ‘धड़कन’
हरीश की मौत सिर्फ एक अंत नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए नई शुरुआत भी बनी। इस अपार दुख की घड़ी में भी राणा परिवार ने महानता का परिचय दिया। उन्होंने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया (आंखें) दान कर दिए।
- अब हरीश की आँखों से कोई और दुनिया देखेगा।
- उनके दिल के हिस्से किसी और के सीने में धड़केंगे।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया?
कानूनी भाषा में इसे इलाज बंद करना कहते हैं, लेकिन एक परिवार के लिए यह अपने कलेजे के टुकड़े को धीरे-धीरे विदा होते देखने की असहनीय प्रक्रिया है। इसमें मरीज को कृत्रिम रूप से जीवित रखने वाली दवाएं और वेंटिलेटर हटा लिए जाते हैं, ताकि आत्मा इस नश्वर और बीमार शरीर के बंधन से मुक्त हो सके।
एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद, हरीश अब उस लोक में हैं जहाँ न दर्द है, न अस्पताल की दीवारें और न ही मशीनों का शोर।


