शरारती तत्वों की ‘साजिश’ या लापरवाही?
सीएनई रिपोर्टर : देवभूमि के जंगलों में आग का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला अल्मोड़ा जनपद में पड़ने वाले ढटवाल गांव का है, जहां कोसी पार स्थित जंगल पिछले कल दोपहर से भीषण वनाग्नि की चपेट में हैं। आग इतनी भयावह है कि दूर-दूर तक केवल लपटें और धुएं का गुबार ही नजर आ रहा है, लेकिन विडंबना देखिए कि इस संकट की घड़ी में न तो वन विभाग जागा है और न ही स्थानीय स्तर पर बचाव की कोई ठोस पहल दिख रही है।

स्थानीय परिस्थितियों और आग लगने के समय को देखते हुए यह आशंका गहरा रही है कि यह किसी शरारती तत्व की सोची-समझी कारस्तानी हो सकती है। अक्सर जंगलों में घास के लालच या अन्य कारणों से लगाई गई आग देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लेती है। ढटवाल के जंगलों में भी यही स्थिति बनी हुई है, जहां की बेशकीमती वन संपदा राख के ढेर में तब्दील हो रही है।
आश्चर्य की बात यह है कि घंटों से जंगल धधक रहे हैं, लेकिन मौके पर वन विभाग का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी नहीं पहुंचा है। विभाग की इस “नदारद” कार्यशैली पर अब सवाल उठने लगे हैं। वहीं, ग्रामीणों की ओर से भी आग बुझाने के लिए कोई सामूहिक प्रयास नहीं किया गया है, जिससे आग की लपटें तेजी से नए इलाकों की ओर बढ़ रही हैं।
दोहरी मार: उमस और प्रदूषण
जंगलों की इस आग ने क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ कर रख दिया है। वनाग्नि के कारण:
- उमस में भारी वृद्धि: आग की गर्मी ने सुयालबाड़ी और आसपास के क्षेत्रों में असहनीय उमस पैदा कर दी है।
- प्रदूषित हवा: हवा में फैले जहरीले धुएं और राख (Soot) के कारण स्थानीय निवासियों, विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों को सांस लेने में कठिनाई हो रही है।
- दृश्यता में कमी: चारों ओर धुएं की चादर लिपटी होने के कारण वातावरण धुंधला हो गया है।
चेतावनी: यदि समय रहते इस आग पर काबू नहीं पाया गया, तो यह न केवल वन्यजीवों के लिए काल बनेगी, बल्कि आबादी वाले क्षेत्रों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर सकती है।


