रजामंदी से शारीरिक संपर्क पर भी मिली उम्रकैद जैसी सजा
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) अर्चना सागर की अदालत का फैसला
देहरादून कोर्ट ने नाबालिग की सहमति से बनाये यौन संबंध को अवैध मानते हुए दुष्कर्म के दोषी को 20 साल की सजा सुनाई। जानें क्यों पॉक्सो एक्ट में उम्र का प्रमाण बयानों से ज्यादा अहम है –
देहरादून: कानून की अज्ञानता अक्सर गंभीर अपराधों का मार्ग प्रशस्त करती है। इसी संदर्भ में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए देहरादून की विशेष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि लड़की नाबालिग है, तो उसकी ‘सहमति’ का कानून में कोई अस्तित्व नहीं है। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) अर्चना सागर की अदालत ने एक किशोरी को बहला-फुसलाकर ले जाने और दुष्कर्म के मामले में दोषी सनी उर्फ सोनू को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
मामले की पृष्ठभूमि: शादी का नाटक और पुलिस की कार्रवाई
यह प्रकरण अप्रैल 2019 का है, जब पटेल नगर कोतवाली क्षेत्र से एक 17 वर्षीय किशोरी अचानक लापता हो गई थी। पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि उनके घर में पूर्व में किराएदार रहे सनी उर्फ सोनू (निवासी हस्तिनापुर, मेरठ) ने किशोरी को प्रेम जाल में फंसाया और उसे हरिद्वार व मेरठ ले गया। वहां आरोपी ने मंदिर में शादी का स्वांग रचाया और गाजियाबाद के एक हॉस्टल में सवा महीने तक उसे अपनी पत्नी बताकर रखा।
कानूनी सबक: बयान बदलने पर भी क्यों मिली सजा?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पीड़िता के बयानों से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान पीड़िता बचाव पक्ष के दबाव में आकर अपने बयानों से आंशिक रूप से मुकर गई और दावा किया कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी।
अदालत की सख्त टिप्पणी: विशेष लोक अभियोजक अल्पना थापा ने मजबूती से पक्ष रखते हुए स्कूल रिकॉर्ड (TC) और मेडिकल साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिनसे सिद्ध हुआ कि घटना के समय पीड़िता की आयु मात्र 17 वर्ष थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी मूल्य नहीं होता।
- यदि पीड़िता पक्ष में गवाही दे भी दे, तब भी वैज्ञानिक और दस्तावेजी साक्ष्य (उम्र का प्रमाण) सर्वोपरि होते हैं।
- नाबालिग के साथ बनाया गया शारीरिक संबंध ‘सहमति’ के बावजूद दुष्कर्म की श्रेणी में ही आता है।
जुर्माना और क्षतिपूर्ति
अदालत ने दोषी सनी पर 20 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है। साथ ही, मानवीय दृष्टिकोण और पीड़िता के पुनर्वास को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि पीड़िता को एक लाख रुपये का प्रतिकर (Compensation) प्रदान किया जाए।

