अधिवक्ता जमन सिंह बिष्ट और अजय सिंह मेहता की प्रभावी पैरवी
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। विशेष सत्र परीक्षण संख्या 39/2024 में विशेष न्यायाधीश (POCSO), अल्मोड़ा की अदालत ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए अभियुक्त सोहन लाल उर्फ सोनू पुत्र सर्वजीत राम, निवासी गड़ाई गंगोली, थाना बेरीनाग, जिला पिथौरागढ़ को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने यह निर्णय 29 सितंबर 2026 को सुनाया।
अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366 और 376(3) तथा POCSO अधिनियम की धारा 5/6 के तहत आरोप लगाए गए थे। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ-साथ चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों का भी न्यायालय द्वारा परीक्षण किया गया।
बचाव पक्ष ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल
अभियुक्त की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जमन सिंह बिष्ट एवं अधिवक्ता अजय सिंह मेहता ने बचाव पक्ष की पैरवी करते हुए मामले के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। बचाव पक्ष ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किए गए गवाहों के बयानों, दस्तावेजी साक्ष्यों तथा चिकित्सकीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए न्यायालय के समक्ष अभियोजन के आरोपों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए।
बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क रखा गया कि आपराधिक मामले में अभियोजन के लिए आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक है। केवल आरोप लगाए जाने या किसी बयान के आधार पर अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि उपलब्ध समस्त साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
धारा 164 CrPC के बयान को लेकर भी हुई महत्वपूर्ण बहस
मामले की सुनवाई के दौरान धारा 164 CrPC के तहत दर्ज बयान के साक्ष्यगत महत्व का मुद्दा भी बचाव पक्ष ने प्रमुखता से उठाया।
बचाव पक्ष की ओर से न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि पीड़िता ने अपने पूर्व बयान के संबंध में पुलिस के दबाव में बयान दिए जाने की बात कही थी। अधिवक्ताओं ने इस पहलू को मामले के साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय महत्वपूर्ण बताते हुए न्यायालय का ध्यान संबंधित न्यायिक सिद्धांतों की ओर आकर्षित किया।
बचाव पक्ष ने इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 164 CrPC के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान को स्वयं में अंतिम या सारवान प्रमाण के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उसका मूल्यांकन विचारण के दौरान न्यायालय के समक्ष दिए गए साक्ष्य और अन्य उपलब्ध सामग्री के साथ किया जाना आवश्यक है।
न्यायालय ने भी इस कानूनी पहलू पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख करते हुए यह माना कि धारा 164 CrPC के अंतर्गत दर्ज बयान अपने आप में सारवान साक्ष्य नहीं है तथा विचारण के दौरान न्यायालय के समक्ष दिया गया साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका रखता है।
चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों की भी हुई जांच
बचाव पक्ष ने मामले में उपलब्ध चिकित्सकीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों की ओर भी न्यायालय का विशेष ध्यान आकर्षित किया। अधिवक्ताओं ने इन साक्ष्यों को अभियोजन के अन्य मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ पढ़े जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अदालत ने सुनवाई के दौरान उपलब्ध मौखिक, चिकित्सकीय तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों का समग्र परीक्षण किया। साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हो सका।
अभियोजन आरोप सिद्ध करने में असफल, अभियुक्त को मिली दोषमुक्ति
मामले में प्रस्तुत समस्त साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद विशेष न्यायाधीश (POCSO), अल्मोड़ा की अदालत ने अभियुक्त सोहन लाल उर्फ सोनू को उसके विरुद्ध लगाए गए धारा 363, 366, 376(3) IPC तथा POCSO अधिनियम की धारा 5/6 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
इस प्रकार अदालत के निर्णय में अभियोजन द्वारा आरोपों को संदेह से परे सिद्ध न कर पाने को महत्वपूर्ण आधार माना गया।
मामले में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता जमन सिंह बिष्ट एवं अधिवक्ता अजय सिंह मेहता ने प्रभावी पैरवी की और गवाहों के बयानों, धारा 164 CrPC के बयान के साक्ष्यगत महत्व तथा चिकित्सकीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर बचाव पक्ष के तर्क न्यायालय के समक्ष रखे। अदालत का यह निर्णय 29 सितंबर 2026 को सुनाया गया।


