अल्मोड़ा और बागेश्वर में आर-पार की जंग
CNE REPORTER, अल्मोड़ा/बागेश्वर: अपनी 27 सूत्रीय लंबित मांगों को लेकर प्रदेशभर के डिप्लोमा इंजीनियर्स का आंदोलन अब उग्र रूप लेने लगा है। अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों में शुक्रवार को भी इंजीनियरों ने कार्य बहिष्कार कर जोरदार प्रदर्शन किया। इस हड़ताल का सीधा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता और सरकारी परियोजनाओं की प्रगति पर पड़ता दिख रहा है, जिससे शासन-प्रशासन की चिंताएं बढ़ गई हैं।
अल्मोड़ा: विधायक मनोज तिवारी ने दिया समर्थन, आंदोलन तेज करने की चेतावनी
अल्मोड़ा के शक्ति सदन में विभिन्न विभागों के डिप्लोमा इंजीनियर्स ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ हुंकार भरी। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार उनकी जायज मांगों की लगातार अनदेखी कर रही है।
- राजनीतिक समर्थन: क्षेत्रीय विधायक मनोज तिवारी ने धरनास्थल पहुंचकर आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह विधानसभा और सरकार के समक्ष इन मांगों को मजबूती से रखेंगे।
- प्रमुख विभाग शामिल: इस प्रदर्शन में लोनिवि, सिंचाई, ग्रामीण निर्माण विभाग (RWD), आवास, कृषि, जिला पंचायत और उरेडा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के इंजीनियर शामिल रहे।
- प्रमुख उपस्थिति: जिलाध्यक्ष इं. जीएस मेहरा, मंडल सचिव इं. दीपक सिंह मटियाली और जिला सचिव इं. ललित मोहन शर्मा के नेतृत्व में भारी संख्या में इंजीनियरों ने हुंकार भरी।
बागेश्वर: निरीक्षण ठप होने से गुणवत्ता पर उठे सवाल, ‘मार्च क्लोजिंग’ पर संकट
बागेश्वर में लोनिवि परिसर में चल रहे धरने में इंजीनियरों ने साफ कर दिया है कि अब लड़ाई आर-पार की होगी। वित्तीय वर्ष की समाप्ति (मार्च क्लोजिंग) के समय हड़ताल होने से सरकारी मशीनरी में हड़कंप मचा है।
- गुणवत्ता पर खतरा: हड़ताल के कारण निर्माण कार्यों का फील्ड निरीक्षण नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार घटिया निर्माण की शिकायतें आ रही हैं, जिससे विकास कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
- अंतिम चेतावनी: आंदोलनकारियों का कहना है कि मार्च खत्म होने में मात्र चार दिन शेष हैं, लेकिन सरकार की संवेदनहीनता बरकरार है।
- प्रमुख उपस्थिति: धरने में इं. नंद किशोर जोशी, बिपिन सनवाल, गोविंद नाथ, संतोष कुमार और देवेंदर कुमार समेत दर्जनों इंजीनियरों ने भाग लिया।
मुख्य मांगें और प्रभाव
इंजीनियरों की 27 सूत्रीय मांगों में मुख्य रूप से पदोन्नति, वेतन विसंगति दूर करना और फील्ड भत्तों में सुधार शामिल है।
“जब तक हमारी मांगों पर लिखित सहमति और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक हम काम पर वापस नहीं लौटेंगे। यह लड़ाई हमारे हक और सम्मान की है।” — संयुक्त संघर्ष समिति


