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स्व. बलवंत मनराल फाइल फोटो

हिंदी साहित्य जगत में हमेशा याद किये जायेंगे साहित्यकार स्व. बलवंत मनराल

एक कार्यक्रम में सपत्नीक स्व. बलवंत मनराल

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते 

……पिता की मृत्यु नही होती, बल्कि वह अपने अंश अपने पुत्रों के रूप में जीवित रहता है। यह परंपरा सदियों से चली आयी है। वास्तव में जब पूज्य पिताजी को याद करता हूं आज भी आंखे नम हो उठती हैं। सत्य तो यह है कि एक साहित्यकार किसी परिवार विशेष का नही रह जाता है। अपनी सृजनशीलता के चलते वह समाज का एक ऐसा अभिन्न अंग बन जाता है, जिस पर पूरे समाज का समान रूप से अधिकार होता है। चाटुकारिता, तिगड़मबाजी, गुटबाजी के दौर से दूर बलवंत मनराल ने साहित्य सृजन के क्षेत्र में कभी समझौता नही किया। जिसका खामियाजा यह रहा कि उन्हें वह स्थान नहीं मिल पाया था, जिसके वह वास्तविक हकदार थे। किंतु फिर भी उनकी जयंती व पुण्यतिथि पर उनका स्मरण एक अथक जिजीविषा के साहित्य सेवी को याद करने का सुअवसर प्रदान करता है— दीपक मनराल

फाइल फोटो — अपने दो पौत्रों सम्राट और युवराज के साथ स्व. मनराल

श्रद्धांजलि : स्व. बलवंत मनराल जन्म : 10 अगस्त 1940, अवसान : 20 जून 2007
हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार स्व. बलवंत मनराल की आज 78 वीं जयंती है। साहित्यकार मनराल आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी अमर साहित्यिक कृतियां हमेशा समाज को दिशा देने का कार्य करती रहेंगी। उनका रचना संसार बहुत सारगर्भित और विस्तृत रहा है कहानी लेखन में आंचलिकता क भाव विशेष आकर्षित करता है। साहित्य जगत के इस दैदीप्यमान नक्षत्र का मनराल का जन्म 10 अगस्त, 1940 को सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में हुआ था। वह मूल रूप से सैंणमानुर, वल्ला सल्ट निवासी थे। बाल्यकाल से ही मनराल लेखन प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो गये थे। 12-13 वर्ष की उम्र से ही मनराल में लेखन प्रवृत्ति जागृत हो गई थी। इस बीच उनकी कई रचनाएं बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई तो लेखन के प्रति उनका रूझान और अधिक बढ़ गया। यह वह दौर था, जब आज की तरह पत्र-पत्रिकाओं की इतनी भीड़ नहीं थी। किसी समाचार पत्र या पत्रिका में लेख प्रकाशित होना तो दूर नाम भी छप जाये तो बहुत बड़ी बात होती थे। तत्कालीन साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘कहानी’ व ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की बड़ी साख थी। इन पत्रिकाओं में नामी-गिरामी लेखक अपनी

फाइल फोटो — एक समारोह में पुरस्कृत होते मनराल

एक रचना प्रकाशित होने के कई-कई माह तक इंतजार किया करते थे। उस दौर में नियमित कहानी लेखक के रूप में मनराल की पहली कहानी ‘कहानी’ पत्रिका में 1960 में प्रकाशित हुई। मनराल का संपूर्ण जीवन काफी संघर्षों में बीता था। शिक्षा पूरी करने के बाद वह अल्मोड़ा से रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गये थे। वहां देश की राजधानी में उन्होंने शिक्षा व्यावसाय को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया। इस दौर में मनराल का लेखन का दौर शुरू हो गया। 60 से 70 के दशक में उनकी 500 से अधिक रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। अनेक सशक्त रचनाओं का मराठी, गुजराती, उर्दू आदि भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। गैर हिंदी भाषी प्रांतों में भी मनराल को अपने साहित्यिक प्रशंसक मिलने लगे। इस बीच दिल्ली साहित्य कला परिषद, कादमिबनी, समागम, दिल्ली राजकीय हिंदी शिक्षा परिषद, शिक्षक अभिभावक संघ, नव साहित्य भारती, साहित्य मित्र मंडली आदि संस्थानों ने उन्हें ढ़ेरों उपाधियों व सम्मानों से नवाजा। उन्होंने ‘नगराज’, ‘निष्ठा’ जैसी तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन भी किया। जब मनराल के साहित्य का तेज चर्तुदिशा में बड़ी तेजी से फैल रहा था तभी क्रूर प्रकृति ने उनके साथ मजाक कर दिया। 25 अक्टूबर 1987 को ब्रेन हैम्रेज के कारण वह पक्षाघात की चपेट में आ गये। ऐसी विषम परिस्थिति में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पुनः स्पीच थिरैपी के जरिये बोलना सीखा। चूंकि स्पीच सैंटर डैमेज होने के कारण वह भाषा भूल गये थे। अतएव दोबारा हिंदी वर्णमाला सीखी। इसके बाद उत्तराखंड आंदोलन के दौरान ‘पहाड़ आगे भीतर पहाड़’ जैसा सशक्त कविता संग्रह रचा। लगभग 15 सालों तक साहित्यिक पत्रिका ‘कत्यूरी मानसरोवर’ का प्रकाशन किया। 20 जून 2007 को बलवंत मनराल कैंसर रोग की चपेट में आने से इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए विदा कह कर चले गये। भले ही मनराल हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी कालजयी रचनाओं के माध्यम से हमेशा हिंदी साहित्य जगत में याद किये जायेंगे।

स्व. मनराल पर डॉ. राजन का लेख —

10 अगस्त, मनराल जयंती पर विशेष : ‘पहाड़ का एक अपराजेय साहित्यकार बलवंत मनराल’

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