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महिला ने सड़क पर जन्मी बच्ची, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में नवजात की मौत

उत्तराखंड में इंसानियत शर्मसार, गर्भवती को रास्ते में छोड़ गया बस चालक, नहीं मिली एम्बुलेंस

चमोली। चमोली व रुद्रप्रयाग के बीच इन्सानियत को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। इस घटना ने राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में सरकार की चिकित्सा व्यवस्थाओं की पोल भी खोलकर रख दी हैं। यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक गर्भवती ने सड़क पर ही बच्ची को जन्म दे दिया। चिकित्सा सुविधा के अभाव में नवजात की मौत हो गई।
चमोली के विकासखंड घाट स्थित घुनी गांव निवासी मोहन सिंह अपनी गर्भवती पत्नी नंदी देवी को प्रसव के लिए बुधवार की सांय ज़िला अस्पताल गोपेश्वर ले गया था। अस्पताल में चिकित्सकों ने नंदी देवी का चेकअप करने के बाद संसाधनों की कमी का हवाला देते हुये उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया। जब मोहन ने हायर सेंटर श्रीनगर जाने के लिए अस्पताल प्रबंधन से एम्बुलेंस की मांग की तो अस्पताल प्रशासन ने एम्बुलेंस देने से इंकार कर दिया। इसके बाद मोहन सिंह ने प्रसव पीड़ा के दर्द से तड़प रही पत्नी के साथ पूरी रात अस्पताल में ही काटी। गुरूवार की सुबह तक एम्बुलेंस न मिलने पर मोहन सिंह गोपेश्वर से प्रात: छह बजे प्राइवेट अपनी पत्नी को साथ लेकर श्रीनगर बेस अस्पताल जाने के लिए निजी बस में सवार हुआ। बताया जाता है कि जैसे ही बस रुद्रप्रयाग के पास पहुंची तो गर्भवती ने पेट मे तेज दर्द की शिकायत की व टॉयलेट जाने की इच्छा जताई। इस पर चालक ने बद्रीनाथ हाईवे पर तिलणी गांव के पास सुनसान जगह पर बस रोक दी। मोहन सिंह अपनी पत्नी को टॉयलेट करवाने के लिए जैसे बस से बाहर निकला तो ड्राइवर ने बस स्टार्ट की व समय कम होने का हवाला देकर जाने लगा। इस पर मोहन सिंह ड्राइवर से रुद्रप्रयाग तक ले जाने की गुहार लगाई लेकिन बस वाले ने एक न सुनी और किराया वापस किये बगैर दोनो को सड़क पर ही छोड़कर रुद्रप्रयाग की तरफ चला गया। इधर सड़क पर नंदी देवी प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। पत्नी की परेशानी देखकर मोहन सिंह ने आपातकालीन वाहन 108 के लिए कॉल कर जानकारी दी। लेकिन वाहन नहीं पहुंचा। इस बीच नंदी ने सड़क पर ही बच्ची को जन्म दे दिया। उचित रखरखाव न होने के कारण नवजात शिशु की सड़क पर ही मौत हो गई। हालांकि बाद में 108 वाहन आया व उसके जरिये नंदी को रुद्रप्रयाग ज़िला अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। वहां महिला का उपचार चल रहा है। लेकिन यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है। बस में कई पढ़े—लिखे लोगों के सवार होने के वाबजूद ने भी गर्भवती महिला की स्थिति को समझ बस नहीं रुकवाई। अगर चालक बस रोककर मात्र तीन किलोमीटर दूर रुद्रप्रयाग तक गर्भवती व उसके पति को ले जाता तो हो सकता था नवजात की जान बच जाती। जबकि मोहन ने अपना व अपनी पत्नी का श्रीनगर तक का टिकट लिया था।

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