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पत्रकार नहीं वह धनपशु है

रजनीश तपन

वह पत्रकार तो कभी था ही नहीं, लेकिन पत्रकारिता की गंगा के किनारे मंडराने वाला ऐसा शख्स था जो लोगों को गंगा भक्त ही दिखाई देता है। इस गंगा में स्नान करने आने वाले उसके निशाने पर रहते हैं। दरअसल वह धनपशु है जिसने न पत्रकारिता के सिद्धांतों को समझा और न ही कभी उन पर चलने का प्रयास ही किया। समाचार चैनल शुरू करके उसने ब्लैकमेलिंग का अघोषित लाइसेंस हासिल कर लिया। जिसके दम पर वह अपना राजनैतिक दलों में अपनी घुसपैठ और समाज में रूतबा बढ़ाता गया। दरअसल रविवार का दिन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का एक काला पृष्ठ माना जाना चाहिए। इस दिन एक व्यक्ति की वजह से पूरी पत्रकारिता कलंकित हुई।
इससे पहले भी उसने अपने कई कारनामों को अंजाम दिया। इसी वजह से दो दिनों से उसे मीडिया जगत में उसे स्टिंग किंग के नाम से उल्लिखित किया जा रहा है। बताया गया कि वह वह इसी नाम से विख्यात था, लेकिन यहां मीडिया से जुड़े बंधु शायद शब्दों की महिमा को गंभीरता से नहीं ले सके, दरअसल वह इस नाम से विख्यात नहीं था, कुख्यात था। उसके कारनामें कभी भी पत्रकारिता का हिस्सा न थे और भविष्य में बनने चाहिए। उसने पत्रकारिता कभी की ही नहीं। सूबे में राष्ट्रपति शासन लगने के दौरान तत्कालीन सीएम का स्टिंग करके भले ही उसे चर्चा मिली हो, लेकिन वह भी पत्रकारिता का हिस्सा नहीं था। उस स्टिंग के निहितार्थ कुछ और थे, जिन्हें पत्रकारिता का जामा पहना कर जनता के बीच परोसा गया। वह किसी एक दल के लिए की गई दलाली या जासूसी ;जैसा भी आपको सुविधानुसार लगेद्ध ही थी। आज जिस आरोप में वह सलाखों के पीछे है, वह भी एक राजनैतिक षडयंत्र के सिवाए कुछ नहीं है। इसमें पत्रकारिता का लेशमात्र भी हिस्सा नहीं है।
दरअसल यह सबक है उन राजनेताओं के लिए जो इस तरह के तथाकथित पत्रकारों को अपना मोहरा बना कर अपने निशाने साधते हैं, और फिर जब खुद निशाने पर आते हैं तो तिलमिलाते रह जाते हैं।आज इस समय सबको यह तो संकल्प लेना ही होगा कि दलालों से पत्रकारिता की गंगा को बचाने का समय आ गया है। इस गंगा को भी निर्मल रखना है तो कोई सरकार अभियान चलाने वाली नहीं है। यह वही गंगा है जो असुविधाओं से जूझ रहे पत्रकारों की कलम से निकलनी शुरू होती हैं और गांव, कस्बों और छोटे शहरों से हाते हुए दिल्ली के सागर में जाकर मिलती हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कुछ अरसे से इस गंगा का उद्गम दिल्ली मान लिया गया है। कोई पत्रकार संगठन अबतक इस मुद्दे पर अब तक कुछ नहीं बोला है। क्यों न हम और आप जैसे पत्रकार ही इस अभियान का चलाएं अपने स्तर पर, और बहिष्कार करें ऐसे ठेकेदार छाप पत्रकारों का जिन्हें कलम चलाने के नाम पर सिर्फ ब्लैकमेलिंग के सिवाए कुछ नहीं आता।

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