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पौराणिक एवं धार्मिक आस्था का केंद्र है कांडा का मॉ कालिका मंदिर

योगेश नगरकोटी: बागेश्वर
कांडा में मॉ काली का मंदिर कुमांऊ की धार्मिक संस्कृत का एक प्रामाणिक प्रतीक है। जिस कारण इस धार्मिक एवं पयर्टन केंद्र की क्षेत्र में ही नही समूचे उत्तराखंड में प्रसिद्ध है। यह एक ऐतिहासिक स्थान है जिसे शंकराचार्य ने 10 वीं शताब्दी में स्थापित किया था। पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार पहले इस क्षेत्र में काल का खौफ था। वो अदृश्य शक्ति जिस किसी ​व्यक्ति का नाम पुकारती तो उसकी मृत्यु हो जाती थी। कांडा क्षेत्र इस खौफ से काफी भयभीत था। अनादि काल में आदि गुरू शंकराचार्य कैलाश मानसरोवर यात्रा करके लौट रहे थे। तो यहां पहुंचते हुए उन्हें अंधेरा हो गया। तो उन्होंने रात्रि में यही विश्राम करने का निर्णय लिया। रात्रि को उन्हें स्वप्न हुआ। और पता चला कि यहां काल नर बलि ले रहा है। उसने कालषण देव को भी अपने वश में कर रखा है। सुबह लोगों ने भी उन्हें अपनी इस पीड़ा के बारे में अवगत कराया कि काल क्षेत्र के लोगों की जान ले रहा है। प्रतिवर्ष एक व्यक्ति के मारे जाने के कारण लोग भयभीत और परेशान थे। तो तत्काल जगतगुरू ने यज्ञ कर मंत्रोउच्चारण से काल को अपने वश में कर स्थानीय लौहार द्वारा निर्मित सात लोहे की कढ़ाईयों से काल को दबा दिया और ऊपर से एक बड़ी शिला स्थापित कर दी। ‘इसे कालशिला के नाम से भी जाना जाता है’ उस शिला के ऊपर काली मॉ का आह्वान करके और कालषण देवता की मूर्ति स्थापित की। जो आज भी यहां विराजमान है। इस शिला को इस तरह से स्थिर रखा गया है कि काल हमेशा काली मॉ और कालषण देव की नजरों के सामने रहे। यानि काल शिला की लंबाई के एक छोर पर मॉ काली और दूसरे छोर पर कालषण देव की स्थापना हुई। इसी स्थान पर यहां पंचबलि का विधान जगतगुरू ने प्रारंभ करवाया। चॅूकि यहां ब्राह्मण रहते थे तो वो बलि नही दे सकते थे। तत्पश्चात जगतगुरू ने इसके लिए कुमांऊ के राजा साही जो डोरमठकोट गांव पिथौरागढ़ में है से मदद मांगी। राजा ने इसे मॉ काली का आशीर्वाद समझ कर अपने तीन पुत्रों में से मझले पुत्र को जगतगुरू को सौंप दिया। तब से मझला यानि जो ‘माजिला’ हैं वही, यहां ब​लि देते है। विक्रम देव सिंह राणा ‘माजिला’ ने सबसे पहले यहां बलि दी। पंचबलि में भैसा, सुअर, मुर्गा, बकरा, छिपकली, नारियल, भुज सम्मलित है। जिससे काल का आंतक हमेशा—हमेशा के लिए समाप्त हो गया। 2011 से सुप्रीम कोर्ट के आदेशाअनुसार बलि प्रथा पर रोक लगा दी गई है। तहसील मुख्यालय स्थित कांडा पड़ाव में कालिका माता मंदिर पहले बहुत छोटा था। वर्ष 1998 में इसे भव्य रूप दिया गया। तब से प्रत्येक नवरात्री पर यहां देवी की अराधना की जाती है। नवरात्र को हमेशा यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। मंदिर में कथा, भागवत और महायज्ञ होते रहते है। कांडा पड़ाव में स्थित माता कालिका के भव्य मंदिर में प्रतिवर्ष लगने वाला मेला क्षेत्रवासियों के साथ—साथ दूर—दराज के लोगों को भी अपनी भव्यता विश्वास एवं अस्था से आकर्षित करता है। आज यह मेले का महत्व पौराणिक होने के साथ—साथ व्यापारिक दृष्टि से भी बढ़ रहा है। बाहर से भी व्यापारी इस मेले में शिरकत करते है तथा कांडा का दशहरा मेला क्षेत्र को एक विशिष्ठ पहचान दिलाने में भी साहयक सिद्ध हो रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार जो भक्त मंदिर में सच्चे मन से आता है काली माता उसकी सभी मनोकामए पूर्ण करती है।

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