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ढ़ाका ग्लेशियर : यहां 50 सालों से बिखरे पड़े हैं सैन्य कर्मियों के शव, लापता विमान के भी अवशेष

हिमाचल। भारत चीन की सीमा पर स्थित ढाका ग्लेशियर में आज की तारीख में भी विगत 50 सालों से सैन्य कर्मियों के क्षत—विक्षत शव बिखरे पड़े हैं। ग्लेशियर में बेहद ठंडे तापमान में आज भी शवों के अवशेष खत्म नहीं हुए हैं। इस बात का खुलासा हाल में एक पर्वतारोही दल ने किया है। दरअसल, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) उत्तरकाशी से जुड़े पर्वतारोही दल को भारत-चीन सीमा पर स्थित ढाका ग्लेशियर (हिमाचल प्रदेश) में 50 वर्ष पूर्व दुर्घटनाग्रस्त वायु सेना के एएन-12 मालवाहक विमान के कुछ और अवशेष मिले हैं। दल ने अवशेषों के निकट बर्फ में दबा एक क्षत-विक्षत शव भी बरामद किया। इसकी सूचना दल नायक राजीव रावत ने 16 जुलाई को सेना के साथ ही हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) व जवाहर पर्वतारोहण संस्थान कश्मीर के अधिकारियों को भी दी है। उन्हें लोकेशन से लेकर फोटो व अन्य जानकारी उपलब्ध कराई गई है। हॉज के प्रधानाचार्य मेजर जनरल अतुल कौशिक व जवाहर पर्वतारोहण संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल ईश्वर सिंह थापा ने बताया कि चिह्नित शव को निकालने और अन्य शवों को तलाशने का अभियान शुरू कर दिया गया है। दुर्घटनाग्रस्त विमान में 98 जवान और चालक दल के चार सदस्य सवार थे। वर्ष 2003 में भी इस विमान के कुछ अवशेष भी मिले थे। इंडियन माउंटेनियरिंग फेडरेशन (आइएमएफ) व ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) की ओर सीबी-13 चोटी के आरोहण और उच्च हिमालय में स्वच्छता अभियान चलाने के लिए बीती एक जुलाई को संयुक्त अभियान दल हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति से रवाना हुआ। इस दल का लीडर उत्तरकाशी के राजीव रावत को बनाया गया, जो निम में इंस्ट्रक्टर हैं। दल में जोशीमठ के नंदू मर्तोलिया और एसडीआरएफ (राज्य आपदा प्रतिपादन बल) के राजेंद्र भी शामिल हैं। टीम लीडर राजीव रावत ने बताया कि जब वह 6200 मीटर ऊंची सीबी-13 चोटी का आरोहण कर लौटे तो इस चोटी के बेस कैंप क्षेत्र में फैले ढाका ग्लेशियर में स्वच्छता अभियान चलाया गया। इस दौरान उन्हें ग्लेशियर में सात फरवरी 1968 को दुर्घटनाग्रस्त हुए वायु सेना के विमान के अवशेष मिले। टीम ने खोजबीन की तो कुछ ही दूरी पर बर्फ में दबा एक क्षत-विक्षत शव नजर आया। राजीव ने बताया कि विमान दुर्घटना के बारे में उन्होंने पहले से ही सुन रखा था। वर्ष 1968 में दुर्घटनाग्रस्त हुए विमान से आंखिरी बार रेडियो संपर्क रोहतांग दर्रे के पास हुआ था और फिर विमान का कुछ पता नहीं चला। इस रहस्य से पर्दा वर्ष 2003 में तब उठा था, जब हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति जिले की चंद्रभागा रेंज के ऊंचे क्षेत्रों में एक अभियान दल को दुर्घटनाग्रस्त विमान के कुछ अवशेष मिले। इसके बाद वर्ष 2009 में चले अभियान के दौरान तीन शव मिले, जबकि वर्ष 2012 में मनाली के पर्वतारोहियों को सेना के एक जवान का परिचय पत्र मिला। जिस पर अर्जुन सिंह, निवासी पुणे लिखा था। वर्ष 2013 में सेना के रेस्क्यू दल को एक क्षत-विक्षत शव मिला, जिसकी हवलदार जमनैल सिंह, निवासी मीरपुर, रेवाड़ी (हरियाणा) के रूप में शिनाख्त हुई। जमनैल सिंह की जेब से पहचान डिस्क, बीमा पॉलिसी और उनके परिजनों काएक पत्र मिला था। पांचवें शव को निम उत्तरकाशी से जुड़े पर्वतारोही दल ने चिह्नित किया है।

ऐसे हुआ था विमान हादसा
सात फरवरी 1968 की सुबह वायु सेना के एएन-12 मालवाहक विमान ने चंडीगढ़ रनवे से लेह की उड़ान भरी थी। विमान में 98 सैन्यकर्मी और चालक दल के चार सदस्य सवार थे। लेकिन, जम्मू-कश्मीर के ऊपर 17-18 हजार फीट की ऊंचाई पर खराब मौसम को देखते हुए लेह से पहले ही फ्लाइट लेफ्टिनेंट एचके सिंह ने वापसी का फैसला कर लिया था। विमान से आखिरी बार रेडियो संपर्क रोहतांग दर्रे के पास हुआ था। इसके बाद यह आसमान में ही गायब हो गया।

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