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…हमने तो पैदल ही छान दिये पहाड़ के गाड़-गधेरे, नौले-गाँव, डाने-काने !

रचनात्मक समाचारों की श्रृंख्ला में हम आपके समक्ष आज से दो घुमक्कड़ मित्रों की ऐतिहासिक यात्रा को प्रस्तुत करने जा रहे हैं। घुमक्कड़ी के शौकीन शोधकर्ता डाॅ. ललित जोशी के कप मार्क्स पर लिखे विशेष आलेख को क्रमशः उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत कर रहे हैं। डाॅ. जोशी ने ऐतिहासिक कप मार्क्स की खोज में कुमाऊं मंडल के दुर्गम इलाकों की पदयात्रा की है। इस खोज़ मे उनका साथ रघुवीर सिंह रौंकली ने भी दिया था। दुर्भाग्य से रौंकली अब हमारे बीच नहीं है। गंभीर रूप से बीमार पड़ जाने से उनका देहावसान हो गया था, किंतु डाॅ. ललित जोशी के साथ किये गये अपने शोध कार्यों के माध्यम से वह हमेशा याद किये जायेंगे। आपको डाॅ. जोशी के इन कप मार्क्स पर प्रस्तुत किया गया गहन शोध अध्ययन कैसा लगा। हमें कमेंट्स मे जरूर लिखें। यदि पसंद आये तो अधिक से अधिक शेयर करना भी न भूलें। कप मार्क्स की इस शोध यात्रा का अगला भाग 18 मई २०१८  को प्रकाशित होगा। तब तक हमारे साथ जुड़े रहें। – सं.

  घुमक्कड़ी ऐसे ही पूरी नहीं होती है। ऐसे ही दुनिया नहीं देखी जाती है। गाड़-गधेरे, नौले, धारे, डाने-काने, गाँव, पंछी आदि देखने के लिए जाना पड़ता है, उनके पास ही। तभी समझा जाता है, अपने परिवेश, अपने वातावरण को। जिस व्यक्ति को अपनी जगह, अपनी विरासत, अपनी संस्कृति का ज्ञान नहीं है। वह व्यक्ति जीवन जीकर भी सदा ही मृत ही रहता है। हमारी धरोहरों को जानने के लिए, सहेजने के लिए घुमक्कड़ होना पड़ता है। हर कोई अपने आप में घुमक्कड़ हो सकता है, यदि वह गाड़-गधेरे, डाने-काने में जाने का शौकिन हो, यदि वह उन स्थानों पर जाकर प्रकृति, संस्कृति, सभ्यता को समझने का प्रयास करता हो तो। राहुल सांकृत्यायन, हीनयान, महायान, कोलंबस, वास्को डीगामा जैसे असंख्यों घुमक्कड़ों व बौद्ध भिक्षुओं ने घुमक्कड़शास्त्र को एक शास्त्र बनाया है। आदि घुमक्कड़ों में आर्य, हूण, शक रहे हैं। मंगोल भी पुरातन घुमक्ककड़ रहे हैं। जैन धर्म के प्रवर्तकों ने घूम घूम कर बड़े काम किये हैं। बुद्ध और महावीर आदि ने घुमक्कड़ी की है। घुमक्कड़ी अपने आप में एक चैलेंज है, एक विधा है। पर्यटन की दृष्टि से तो यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। पर्यटन विभाग को भी घुमक्कड़शास्त्र रचना चाहिए। पयर्टन विभाग में सेवा देने वालों की परीक्षा भी इसी शास्त्र के इर्द-गिर्द ही घुमती है। मैं घुमक्कड़ी को प्रकृति के साथ तारतम्यता बैठाने वाले व्यक्ति की प्रसंशा करता हूं कि प्रकृति उन्हें स्वयं बुलाकर लिखने-पढ़ने-घुमने के लिए प्रेरित करती है। समाज का कल्याण भी घुमक्कड़ी के बाद ही कल्याण हो सकता है। जब आदिशंकराचार्य जी ने दक्षिण से आकर हिमालय में तप किया, जब नीम करौली बाबा, हैड़ाखान बाबा, विवेकानंद जी आदि संत व योगियों ने यहां आकर इस भूमि में चेतना का प्रसार किया, तो घुमक्कड़ी का उद्देश्य पूरा हो गया। भारतवर्ष तो वैसे ही संत-ऋषियों, तपस्वियों की तपोस्थली रही है। किसी ने घूम-घूम कर सेवा की है, तो किसी ने अपने हाड़-मांस गला कर सेवा की है। यही असल में घुमक्कड़ी का परम उद्देश्य मुझे जान पड़ता है। घुमक्कड़ी से बड़ा न तो शास्त्र है, और न ही सेवा। जरूरी यह भी नहीं कि घुमक्कड़ी करने वाला हर किसी तरह की जानकारी को समेट लाये। हमें यह अपेक्षा उनसे नहीं रखनी चाहिए। यदि वह घूमने के साथ-साथ समाज के सत्य को उद्घाटित करता है, तो वह घुमक्कड़ी की सेवा करना है। देश में आज पयर्टन को बढ़ावा दिया जा रहा है, इससे आर्थिक उद्देश्य पूर्ण होते हैं, लेकिन क्या यह उन असंख्यों पुरातन घुमक्कड़ों की भांति हैं, जिन्होंने घूमने के साथ-साथ उस देश-प्रदेश व क्षेत्र को ख्याति दी है ? इस पर चिंतन-मनन करना होगा। पयर्टन विभाग को यदि पयर्टन को विकसित करना है तो उन्हें इस दृष्टि से सोचने की जरुरत है। हम पर्यटन से व्यवसाय तो कर ही रहे हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि उससे हम समाज की सेवा नहीं कर पा रहे हैं। हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए हिक घुमक्कड़ी के माध्यम से सेवा हो, उस क्षेत्र की कीर्ति सभी जगह फैले, उस स्थान की अच्छाई को सब जानें।
मैंने भी कई घुमक्कड़ी अपने जीवन में की हैं। मैं इतना बड़ा अनुसंधाता तो नहीं, लेकिन जितनी भी यात्राएँ की हैं, वह अपने आप में इतिहास ही रही हैं। करीब 10 वर्षों से मैं घुमक्कड़ी कर अपने परिवेश, संस्कृति, अपने लोगों के बीच घुलने-मिलने का प्रयास करता आया हूं। शुरूआती दौर में मैं अकेला ही घुमक्कड़ रहा हूं। फिर कभी-कभार एनजीओ में कार्यरत छोटे भ्राता देवेन्द्र के साथ जाया करता था। देवेन्द्र किसी एनजीओ से जुड़ा हुआ था। वह गाड़ियों और जानवरों का इंश्योरेंश करता था। कई बार उसके साथ में जगह को देखने के लिए उसके साथ चला जाता था। वह इंश्योरेंश करने की प्रक्रिया को पूर्ण करता तो मैं उस क्षेत्र में या तो भ्रमण कर आता और या फिर उस स्थान के बारे में कई जानकारी अपने संस्मरणों में जीवित कर लाता। अपनी घुमक्कड़ी में मैंने कई संस्मरण जीवित किए हैं। अल्मोड़ा, बागेश्वर, लोहाघाट, देवीधूरा, नैनीताल आदि कई स्थानों में घुमक्कड़ी कर मैंने अपने मन को संतुष्ट किया है। मुझे घुमक्कड़ी में बड़ी उम्मीद दिखती है। इससे हम अपने परिवेश को जानते तो हैं ही साथ ही साथ लोगों से परिचय भी प्राप्त करते हैं। देखने-सुनने को मिल जाता है। घुमक्कड़ी एक शास्त्र की तरह है, जिसको जानने के लिए दुरूह रास्तों को पैदल-पैदल नापना पड़ता है। क्रमशः

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6 comments

  1. अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा…

  2. सुमित शाह

    बहुत अच्छे ललित जी

  3. डॉ ललित चंद्र जोशी 'योगी'

    आपका सादर स्वागत है मनराल ददा। हमारी घुमक्कड़ी आपके सहयोग से प्रकाशित हो पाई है। सधन्यवाद।

  4. कैलाश चन्द्र जैन

    बहुत अच्छा यात्रा वृत्तांत लिखा है।जैनों का उल्लेख पसंद आया।
    कै.च.जैन.इन्दौर.

  5. कैलाश चन्द्र जैन

    बहुत अच्छा यात्रा वृत्तांत लिखा है।जैनों का उल्लेख पसंद आया।
    कै.च.जैन.इन्दौर.
    Note,-Not duplicate comment.For the first macking comment sir

  6. बहुत सुंदर गुरु जी बहुत कुछ सीखने को मिला इससे

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