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बीच सफर में मुझे अकेला छोड़ गया 270 से अधिक पदयात्राओं का साथी रौंकली

दो घुमक्कड़ मित्रों की गांव-गांव घूमने की पदयात्रा पर उस समय विराम लग गया, जब सफर का एक साथी रघुवीर सिंह रौंकली थक गया। वह अपने मित्र डाॅ. ललित जोशी को बीच सफर में छोड़ उस लोक की यात्रा पर निकल पड़ा, जहां से कभी कोई लौटकर नहीं आता। तो आइये सी.एन.ई. यानी क्रियेटिव न्यूज़ एक्सप्रेस के साथ आपको लिये चलते हैं गतांक से आगे की यात्रा पर डाॅ. ललित जोशी के संस्मरणों के साथ –

गतांक 15 मई, 2018 से आगे…..http://creativenewsexpress.com/dr-lalit-joshi-yogi-yatra1/
……मुझे एक बार की घुमक्कड़ी का याद है कि सन् 2014 में मैं, देवेंद्र के साथ बागेश्वर के किसी गांव में इंश्योरेश के लिए गया। वह गाड़ी का इंश्योरेंश कर रहा था और मैं उस क्षेत्र की जानकारी को बटोर रहा था। करीब लौटते हुए पौड़ी की धार से आगे निर्जन स्थान पर हमारी बाईक पंक्चर हो गयी। उस समय करीब सायं 6 बज रहा होगा। अंधेरा घिर-घिर कर हमारे आंखों के सामने लौट कर आ रहा था। लोगों से सुना की यहाँ पंक्चर की दुकान कहीं है। किसी ने बताया कि है तो सही, परंतु यहां से करीब 3 किमी आगे जाना होगा। अब मुसीबत यह थी कि हमारी बाईक में पीछे सवारी कैसे बैठाई जाए। इसीलिए देवेंद्र अकेले ही बाईक लेकर निकल पड़ा और मैं उसके साथ-साथ पीछे भागते-भागते हुए चल रहा था। करीब 5 किमी की दौड़ मैंने उस दिन मारी थी। वह बाईक वाले से पंक्चर ठीक करा रहा था, और मैं तब घुप्प अंधेरे में पहुचा। हम पुनः अल्मोड़ा के लिए बाईक में सवार हो गये। घुमक्कड़ी में कुछ भी हो सकता है, काफी संघर्ष के लिए तैयार बैठना होता है। कुछ भी समस्या सामने खड़ी हो सकती है। ऐसे ही एक बार और बागेश्वर के किसी दूसरे गांव हम गये थे। उस दिन भी करीब 5-7 किमी पैदल और भागकर उसके पीछे-पीछे पंक्चर वाले की दुकान में पहुंचा। उस दिन में अंधेरा हो गया था। जाड़ों के दिन थे, दुकान वाले भी जल्दी निकल जाते हैं। देवंेन्द्र से कहा कि तुम निकल कर पंक्चर कराओ किसी भी तरह से और मैं अकेले आ जाऊंगा। अंधेरे में अंजान सड़क और गहरा जंगल था, अगर बाघ या तेंदुआ उठा भी ले जाता, तो किसी को पता नहीं चले, लेकिन इस दिन भी मैं पीछे-पीछे पंक्चर बाईक के साथ दौड़ रहा था। करीब तीन या चार किलोमीटर इस दिन भी भागा हूंगा। यह भागने का अनुभव पहला नहीं, अपितु दूसरा था। उस दिन भी भगवान ने पंक्चर वाली दुकान खुली रखी थी। शायद यह हमारी किस्मत ही थी। अन्यथा अंधेरे में किसकी दुकान खुली रहती है। इसके अलावा एक बार हम बागेश्वर से ही रात को लौट रहे थे। रास्ते में एक तेंदुआ दिखा। अंधेरे में लाइट पड़ने से उसकी आंखंे चमक रही थी। वह सड़क के नीचे की तरफ दुबक कर न जाने किसी पर झपटने के लिए मुस्तैद था। लाइट और हार्न की लगातार आवाज ने उसको अपने आसन तोड़ने पर मजबूर किया और वह थोड़ा नीचे की तरफ निकल गया। यह दिन भी काफी रिस्की था। याद करने वाला दिन रहा। कहने का यह अर्थ है कि घुमक्कड़ी के लिए हमको असुविधाओं का ध्यान नहीं रखना चाहिए। जब अल्मोड़ा में पीएचडी के लिए नामांकन हुआ तो इतिहास विषय के लिए रघुवीर सिंह रौंकली के साथ पैदल घुमक्कड़ी की। इससे पहले मैंने कई गांवों को पैदल छाना था। जब से मित्र रघुवीर सिंह रौंकली एक दिली घुमक्कड़ के रूप में मिला, तो मेरी घुमक्कड़ी को और अधिक आयाम मिले। अब हम दोनों घुमक्कड़ मित्र पैदल कई-कई किलोमीटर चल पड़ते। गाड़-गधेरे, नौले धारे, जंगल आदि को देख कर, लांघ कर वापस भी पैदल ही डेरे पर पहुंचते। अंधेरी रात में हम दोनों घुमक्कड़ पहुंच जाते। जेठ की चुभती दुपहर हो या फिर कड़ाके की ठंड हम दोनों घुमक्कड़ों के उत्साह को कम नहीं करती। हम दोनों मित्र घुमक्कड़ों ने करीब 70 से अधिक गांवों का पैदल भ्रमण, 270 से अधिक की पद यात्राएं कीं। जिसमें हमने कई वीरखम्भ व धर्मशालाओं जैसी ऐतिहासिक सामग्रियों को खोजा। करीब 70 से अधिक छोटे-बड़े कप माक्र्स को हमने खोजा। हमारी घुमक्कड़ी में हमारी सहपाठी इतिहास की शोधार्थी हर्षिता तिवारी, नीलम, लाॅ के स्टूडेंट योगेश जोशी आदि भी साक्षी रहे हैं। आज हम दोनों घुमक्कड़ों में से एक घुमक्कड़ साथी व इतिहास के शोधार्थी रघुवीर सिंह रौंकली जी हमारे बीच नहीं हैं। ईश्वर की न जाने क्या इच्छा रही कि उच्च हिमालयी क्षेत्र से इस उत्तराखंड को आने वाले समय में मिलने वाला एक भावी इतिहासकार छीन लिया। रघुवीर सिंह रौंकली व्यांस, चैंदास व दारमा घाटी के बीच के निवासी रहे हैं। उन्हें अपने क्षेत्र की कई विस्तृत जानकारियां थी। उनकी यह इच्छा थी कि अपने ‘रं‘ समुदाय के बीच बसी हुई लोककथाओं, गाथाओं आदि का संकलन मेरे साथ करें। हमने अल्मोड़ा से मुनस्यारी, दार्चुला आदि तक पैदल यात्रा का मन बनाया था और वहां की संस्कृति को लेखनी के माध्यम से सदा के लिए जीवित करना था। राजुला मालूशाही की गाथा को कविता के माध्यम से हम लिख रहे थे, जिसकी सिर्फ चार ही पंक्तियां लिख पाये थे। वह भी ऐसी की ऐसी ही रही। साथ ही वहां की लोकोक्तियां, वहां के शब्दों की डिक्शनरी भी बनाने का उद्देश्य था, लेकिन आज वह उनके निधन हो जाने से धरा का धरा ही रह गया। रघुवीर सिंह रौंकली जी और मैंने कई धर्मशालाओं, कई प्रागैतिहासिक कप माक्र्स का चिन्हीकरण किया था। उनका यह मानना था कि हम दोनों इस तरह अलग-अलग वाॅल्यूम में किताबें रचें। अपनी ऐतिहासिक यात्राओं की पुस्तक निकालें और लोगों को बतायें कि इस हिमालयी राज्य में आज भी कई ऐतिहासिक अवशेष विद्यमान हैं। आज हम अपने इस हिमालयी राज्य का नाश करने पर तुले हुए हैं। बंदरबांट ने इस हिमालय की अंतड़ियों को भी नहीं छोड़ा। हिमालय के प्रति दिवंगत रघुवीर सिंह जी के विचार मुझे आज भी याद हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह मुझे कह रहे हों, कि जोशी जी इस हिमालय का हम दोनों घुमक्कड़ पूरा भ्रमण करेंगे, इस हिमालय को जानंेगे। कई तरह की बातें, कई तरह के हम दोनों के वार्तालाप, कई संस्मरण मेरे जेहन में जीवित हैं। उनके निधन होने से भीतर का सागर उमड़ पड़ता है। ऐतिहासिक यात्राओं के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उनके पास ही रह गए। क्रमशः अगल भाग 22 मई 2018 को

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2 comments

  1. हरीश कार्की

    रघुवीर सिंह रौंकली को हम प्यार से ‘रघु दा’ कहते थे।क्या इंसान थे वो।साथी खोने का दुःख भला उसके साथी के अलावा कौन समझ सकता है।मैं उनका साथी तो नहीं था पर उनसे परिचय जरूर था।मैं भी उनके साथ वितायें हुए एक एक पल को कभी नहीं भूल सकता।मेरी नज़रों में ऐसे लोग विरले ही हैं।फिर भी उन जैसा दूसरा कोई नहीं।भगवान की मर्जी के सामने सभी विवश हैं।उनके मृत्युलोक को त्यागे 7-8 महीने हो गए है फिर भी ऐसा लगता है वो हमारे साथ हैं।मैं आपके लिए भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि आपको उनकी कमी का अहसास न कराये।उनकी गैरमौजूदगी आपके कार्य में रुकावट का कारण न बने।आप अपने उद्देश्य में सफल होवें।

    • डॉ ललित चंद्र जोशी 'योगी'

      कार्की जी बहुत दुःखद रहा। बहुत सपने बिखर गए। आज भी अफ़सोस है।

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