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नासमझ मिटा रहे कप कप मार्क्स का इतिहास, बेखबर है शासन-प्रशासन

ऐतिहासिक कप मार्क्स की यह खोज यात्रा जारी है। डाॅ. ललित जोशी सबसे अधिक व्यथित इस बात से हैं कि इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सड़क निर्माण के दौरान बेदर्दी से मिटा डाला जा रहा है। परातत्व विभाग व शासन-प्रशासन इस दिशा में उदासीन बना हुआ है। पहाड़ों में मिलने वाले कप मार्क्स केवल अल्मोड़ा ही नहीं पूरे विश्व के लिए शोध का विषय हैं। आंखिर हमारी सरकार इतनी उदासीन क्यों हैं ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेष
गतांक से आगे……….यूरोप में जो कप माक्र्स प्राप्त होते हैं वह भारत में प्राप्त हो रहे कप माक्र्स से काफी छोटे प्राप्त होते हैं। स्कैनिडनावियन में करीब 30,000 कप माक्र्स चिन्हित किए गए हैं। सोबन सिंह जीना परिसर के इतिहास विभाग द्वारा 2008 में फड़कानौली वन विभाग की चुंगी के निकट करीब 100 मीटर की ढ़लान में स्थित गुफा के नीचे शिलाखण्ड में 50 से अधिक कप मार्क्स प्राप्त किये।
जिनका अधिकतम व्यास 18 सेमी व गहराई 6 सेमी तथा न्यूनतम व्यास 3 सेमी व गहराई 1 सेमी है। कुमाऊँ में हमें कप मार्क्स देवीधुरा, फड़कानौली, पिथौरागढ़ के सिलौली, जालली, दौलाघट, फलसीमा, जसकोट, भनार, कसारदेवी, चितई, पेटशाल, सिमतोला, कटारमल, कपोली (बासोट), तिखून, डोलीडाना, बगवालीपोखर, मिरई, विमाण्डेश्वर, राणीतोला (बाडेछीना) आदि स्थानों पर प्राप्त हुए हैं। बगवाली पोखर अल्मोड़ा जिले का ही एक कस्बा है। यहां भी प्रागैतिहासिक चिन्ह (कप माक्र्स) की प्राप्ति हुई है। ये कप मार्क्स नाशपाती के आकार के हैं। साथ ही दीप के आकार के हैं, जो बेतालेश्वर के 24 कप माक्र्स की भांति प्रतीत होते हैं। इन कप मार्क्स को खोदने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है। आज भी इसको चट्टानों पर खोदने का कारण अज्ञात है। उत्तरी अमेरिका से लेकर यूरोप, एशिया, अफ्रीका और पैसिफिक आईसलैंड में सामान्य उद्देश्य रूप में बनाये हुए मिलते हैं। कई विद्वानों का मानना है कि कप मार्क्स में लोग पवित्र जल या दूध, भगवान के लिए चढ़ाने के लिए रखते थे। पश्चिम में कई शोधार्थी इसे आग का अग्रदूत मानते है और सूर्य तथा भीषण ठंड से जोड़ते हैं। कई इसे सूर्य, अंतरिक्ष, सौर का प्रतीक मानते हैं। हालांकि भारत में कप मार्क्स के बारे में मत-मतांतर हैं। अभी स्पष्टतः कुछ नहीं कहा जा सकता। कोई इसे शवाधान के साथ जोड़ता है तो कोई जमीन में धन आदि छुपाने के लिए स्थान कहते हैं, परंतु खोजकर्ताओं ने इसे प्रागैतिहासिक कालीन कला के रूप में भी संबोधित किया है। पुरापाषाण काल के बाद आद्य इतिहास के भी जिसे हम महापाषाण संस्कृति भी कहते हैं। ताम्र व लौह युग के भी कई प्रमाण प्राप्त हुये हैं। इनमें सर्वप्रथम शिलाखंडों व चट्टानों पर बने गड्ढे प्रमुख हैं, जो ओखली के समान धँसाव लिये हुये हैं। इन्हें ‘कप मार्क्स’ कहते हैं। यह कप मार्क्स महा पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेष माने जाते हैं। 1856 में डब्लू.जे. हेनवुड ने एडिनबर्ग न्यू फिलोसीफिकल जनरल में देवीधुरा (चंपावत) के इन ‘कपमाक्र्स’ का विवरण प्रकाशित किया था। सन् 1877 में एच.आर. कारनक ने अपने (जनरल आॅफ द एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल)
द्वाराहाट की शिलागत आकृतियों का लेख प्रकाशित किया तथा चन्द्रशेखर मंदिर से लगभग 180 मी. दक्षिण में एक चटृान पर 200 ‘कपमामार्क्स’ बारह सामान्तर पंक्तियों में खुदे मिले तथा यहां से 30 किमी पश्चिम में रामगंगा घाटी में स्थित नौलाग्राम के देवी मंदिर के आहते में यशोधर मठपाल द्वारा खोजे कपमाॅक्र्स हैं। इसके अतिरिक्त डाॅ. एमपी जोशी द्वारा कुमाऊँ में जसकोट, देवीधुरा, ग्वाड़ आदि स्थानों पर भी ओखल सदृश (धँसाव) के चिह्न प्राप्त किये हैं। जनपद पिथौरागढ़ के सिलौली गांव में 7 मार्क्स एक चट्टान पर मिले हैं जो 12 इंच गहरे व 9 इंच व्यास के हैं जो विशिष्ट उदाहरण हैं।
ऐतिहासिक यात्राओं के दौरान हमने प्रागैतिहासिक कला को एकत्रित करने का प्रयास किया। हालांकि विद्वानों ने भी कप मार्क्स के बारे में बतलाया है। प्रो. डीपी अग्रवाल, पद्मश्री यशोधर मठपाल, डाॅ0.जीवन चंद्र खर्कवाल, डाॅ. वीडीएस नेगी, डाॅ. संजय टम्टा, प्रो. एमपी जोशी,
डाॅ. सीएस चैहान, प्रो. अनिल कुमार जोशी, प्रो. अजय रावत, पद्मश्री शेखर पाठक, दिवंगत रघुवीर सिंह रौंकली, डाॅ. ललित चंद्र जोशी आदि अध्येताओं, इतिहासकारों, शोधार्थियों ने कप माक्र्स पर अपनी प्रतिक्रिया अलग-अलग तरह से दी है। इसके फलस्वरूप हमने अल्मोड़ा जिले के कप माक्र्सों को खोजना प्रारम्भ किया। कई जगह जैसे चितई के जंगल, कटालमल की धार, बेतालेश्वर, फलसीमा, कसारदेवी, गधौली, एचएम काॅलेज के नीचे विरान जंगल में। इन सभी जगह छोटे-बड़े करीब 50 से अधिक कप माक्र्स हम संज्ञान में उत्तरांचल दीप के माध्यम से लाये हैं। इन यात्राओं के बाद जब मेरा उन पथों पर जाना हुआ तो करीब एक दर्जन से अधिक बड़े कप माक्र्स चट्टानों के क्षतिग्रस्त कर दिए जाने से उनका इतिहास खत्म हो गया, जिसका मुझे दुःख है। दिवंगत रघुवीर और मेरा सपना था कि हम इन कप मार्क्स को चिन्हित कर इनकी दिशा और पथ आरेख खींचकर सरकार से यह मांग करेंगे कि इनको सुरक्षित रखा जाये, लेकिन आज कई कप माक्र्स बिखर गए हैं।
क्रमशः – शेष भाग अगले सप्ताह

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