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व्यंग्य/…….झप्पी विथाउट पप्पी

कई चींजें कॉम्बिनेशन में ही अच्छी लगती है। जिससे इनका प्रभाव और तगड़ा और गहरा हो जाता है। जैसे भात-दाल, दाल-रोटी, मक्के की रोटी सरसों का साग, नेता और घोटाले, गर्ल फ्रेंड और नखरे इन सबका मजा साथ-साथ होने पर ही है। ठीक वैसे ही झप्पी के साथ पप्पी का …

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व्यंग्य — …………. अब तो जेल में तंदूरी नहीँ तंदूर बनने का डर

कहते हैं ​ललित शौर्य का ‘अंदाज़-ए – बयाँ  कुछ और’। मौजूदा हालातों पर सटीक टिप्पणी शौर्य के आलेखों की विशेषता है। उनके व्यंग्य समाज और कानून की व्यवस्था पर जबरदस्त तंज कसते हैं। मौजूदा व्यंग्य में ललित ने भारतीय जेलों में अपराधियों को मिलने वाली सुविधाओं को प्रकट किया है। हाल …

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व्यंग्य :  महोब्बत बँग्ले वाली…

राजनीति में सत्ता जाते ही बहुत कुछ जाने लगता है। मौज और ऐश कैश के साधन घटने लगते हैं। सत्ता ना होने पर राजनीति की टोंटी से मस्ती का पानी टपकना बंद हो जाता है। जो टोंटी सत्ता रहते खूब पानी उगलती थी सत्ता जाते ही उसे सूखा मार गया। …

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