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मध्य और पश्चिमी हिमालयी की संकट ग्रस्त लोक भाषाओं पर किया मंथन

अल्मोड़ा। दून पुस्तकाल एवं शोध केंद्र तथा बीपी कोईराला इंडो नेपाल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार के पहले दिन मध्य और पश्चिमी हिमालय की संकट ग्रस्त लोक भाषाओं पर विमर्श किया गया। इस अवसर पर नार्वो, पौलेंड, रूस, नेपाल सहित भारत के विभिन्न राज्यों उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदि के प्रतिभागियों ने भाग लिया। आयोजन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के निदेशक प्रो. बीके जोशी ने कहा कि भाषा का संकट केवल अभिव्यक्ति का संकट नही है। बल्कि भाषा के समारत होने का प्रभाव संस्कृति रहन—सहन और जीवन शैली पर भी पड़ता है। भाषा के विलुप्त से उससे जुड़ा इतिहास भी समाप्त हो जता है। पहले दिन के पहले सत्र को लखनऊ विश्वविद्यालय के भाषा विभाग की प्रो. कविता रस्तोगी ने संकट ग्रस्त राजी जनजाति की बोली भाषा और उनके समाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा की हिन्दी और कुमांऊनी के प्रभाव के कारण राजी बोली प्रभावित हो रही है और हिन्दी का प्रभाव भी राज्यों के बीच बढ़ रहा है। इसके बाद पौलेंड से आए प्रो. क्रिस्टांफ की हिमालयी भाषाओं में केवल 3—4 ऐसी भाषाएं मिलती है। जिनके पुराने ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि नेपाली , कुमांऊनी, गढ़वाली नेपाली आदि भाषाओं को डिजिटल संग्रह पर भी काम चल रहा हैं इस सेमिनार में 25 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जायेगें। इस अवसर पर सेमीनार के आयोजन जुड़े प्रो. एमपी जोशी चंद्रशेखर तिवारी, त्रिभुवन विश्व​विद्यालय के चुरामणी बंधु रस्यिन एकाडमी सांइस की अनास्टॉसिककिअनास्टॉसिकिया, क्रिस्लोया, जुलिया, एबेनिया कुमांऊ विश्व विालय के प्रो देव सिंह पोखरिया, प्रो दिवा भट्ट, डॉ ललित जोशी, शिप्रा पंत, मनिषा पांडे सहित अनेक सहित अनेक भाषाविद् व स्थानीय गणमान्या लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रकाश चंद्र फुलोरिया ने किया।

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