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10 अगस्त, मनराल जयंती पर विशेष : ‘पहाड़ के एक अपराजेय साहित्यकार थे बलवंत मनराल’

डॉ. रमेश चंद्र पाण्डेय ‘राजन’
‘सृजनधाम’, 12 अमरावती गली, जाखनदेवी अल्मोड़ा

आज 10 अगस्त अपराजेय साहित्यकार बलवंत मनराल की जन्मतिथि है। हिंदी के साठोत्तरी युग के सुप्रसिद्ध साहित्यकार उवं चर्चित कथाकार मनराल जी पक्षाघात के कारण अस्वस्थता की स्थिति में भी अपने जीवन के अंत तक अपनी कलम चलाते रहे। यहां मनराल जी को आत्मीयता से याद कर रहे हैं उनके घनिष्ठ रहे साहित्यकार

आज के हिंदी भाषी समाज को यह अवश्य पता होगा कि बलवंत मनराल हिंदी के साठोत्तरी युग के चर्चित कथाकार थे। बचपन से ही मन में साहित्यिक चेतना की तीव्र प्रबलता के कारण इंटरमीडिएट की परीक्षा के दौरान गणित की उत्तर-पुस्तिका में कविताओं की रचना कर देने वाले बलवंत का नियमित लेखन 1960 में ‘कहानी’ पत्रिका के माध्यम से शुरू हुआ। हिन्दी साहित्य में अनेक रूपों के बावजूद कहानीकार के रूप में बलवंत मनराल एक चर्चित नाम रहा।
अपने जीवन के अंत तक अपनी लेखनी के माध्यम से देश-विदेश में फैले उत्तराख्ंाड के अपने पहाड़ी भाई-बहनों को पहाड़ की मान मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखने की प्रेरणा देने वाले, शाश्वत महत्व का साहित्य रचने वाले और राजनीतिक विद्रूपताओं की दरिंदगी को उजागर कर देने वाले बलवंत मनराल का 20 जून 2007 को दिल्ली में निधन हुआ। तब वे 67 वर्ष के थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, विविध और व्यापक आयाम लेती हुई उनकी कहानियां, कवितायें, उनकी हास्य-व्यंग्य पूर्ण साहित्यिक विधाएं, लयात्मक संस्कारयुक्त बाल कवितायें सबकुछ हमारे बीच हैं। साहित्य मनीषी बलवंत मनराल का जन्म 10 अगस्त 1940 को कत्यूरी वंश के राजपूत घराने में हुआ। पिता शिवेन्द्र मनराल रानीखेत, पिथौरागढ़ एवं अल्मोड़ा में रीडर, लैंड पेशकार तथा सदर कानूनगो जैसे पदों पर रहे। अपने पिता के साथ रहते हुए बलवंत मनराल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रानीखेत से प्राप्त की। राजकीय इंटर कालेज, अल्मोड़ा से 1954 में हाईस्कूल की परीक्षा विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण करने के बाद उसी कालेज से 1956 में इंटरमीडिएट की परीक्षा के दौरान गणित की उत्तरपुस्तिका में कविताओं की रचना कर देने वाले मनराल अनुत्तीर्ण हो गये। पुनः साहित्यिक वर्ग से 1958 में रामजे इंटर कालेज अल्मोड़ा से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने वाले मनराल ने 1960 में अल्मोड़ा के डिग्री कालेज से बीए, उसी कालेज से 1962 में एमए तथा 1963 में बीटी की परीक्षायें पास की। बीटी करने के उपरांत बलवंत मनराल दिल्ली में तिलक नगर स्थित एक राजकीय विद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गये। एक साल बाद उन्हें पोस्ट ग्रेजुएट टीचर के रूप में मोतीनगर के एक दूसरे विद्यालय में नौकरी मिल गई। इस प्रकार उन्होंने दिल्ली में एक शिक्षक के रूप में कई संस्थाओं में कार्य कर काफी लोकप्रियता अर्जित की। अल्मोड़ा के डिग्री कालेज में पढ़ते हुए 1960 से उन्होंने लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया। उनका नियमित लेखन 1960 में कहानी पत्रिका के माध्यम से शुरू हुआ। अपने छात्र जीवन से ही वे साहित्यिक गतिविधियें में खूब रूचि लेते थे। वे 1956 में राजकीय इंटर कालेज, अल्मोड़ा में हिंदी परिषद के सचिव रहे। तब वे विभिन्न समारोहों और प्रतियोगिताओं में वाद-विवाद, भाषण तथा नाटकों में खूब भाग लिया करते थे। अगस्त 1956 में उन्होंने अल्मोड़ा में आयेाजित ‘ध्रुवस्वामिनि’ नाटक के अभिनय में सर्वोत्कृष्ट अभिनेता का खिताब जीता था। तब अल्मोड़ा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का अच्छा केन्द्र हुआ करता था। अल्मोड़ा में पढ़ते हुए 1956 में मनराल साम्यवादी विचारधारा के ‘लेखक संघ’ से जुड़े और उसके सचिव भी चुने गये। तब वैज्ञानिक दाऊकृष्ण वर्मा इस संघ के अध्यक्ष थे। अल्मोड़ा डिग्री कालेज में बीटी करते हुए रमाशंकर सनवाल द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र ‘नगराज’ का भी इन्होंने कुछ समय तक संपादन किया। उनके दिल्ली चले जाने के बाद यह पत्र बंद हो गया। दिल्ली जाकर वे साहित्य जगत से नियमित रूप से जुड़ गये तथा कादम्बिनी, धर्मयुद्ध, ज्ञानोदय, सरिता, साप्ताहिक हिन्दुस्तान इत्यादि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। कादम्बिनी की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी को प्रथम स्थान मिला। कहानी से ही मनराल ने अपना लेखन शुरू किया और कहानीकार के रूप में बलवंत मनराल एक चर्चित नाम रहा। अध्यापन के साथ-साथ साहित्य साधना में रत श्री मनराल 25 अक्टूबर 1987 को अकस्मात मध्य रात्रि के समय पक्षाघात की चपेट में आ गये। वे लम्बे समय तक मरणासन्न स्थिति में रहे। पक्षाघात के कारण उनका चलना-फिरना, हँसना-बोलना, लिखना-पढ़ना सब कुछ प्रभावित हो गया। तब वे बोल तक नहीं पाते थे। स्थिति यह हो गई थी कि शरीर को जैसे लकुवा मार गया था। लेकिन अन्दर से जिजीविषा और जीवटता बनी रही। क्योंकी श्री मनराल एक अति संवेदनशील लेखक थे। उन्हीं के अनुसार ‘‘उत्तराखंड आंदोलन के दौरान खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर कांड से मैं इतना मर्माहत हुआ कि मेरी रुद्ध शिराओं में 2 अक्टूबर 1995 की रात से एक सनसनी सी पैदा होने लगी। मेरा मन उद्वेलित हो उठा।‘‘ वे कहते भी थे कि, ‘‘इसे एक चमत्कार ही कहिये कि उसी रात से मैंने स्फुट शब्दों में कवितायें लिखनी शुरू कर दी।’’ इन्हीं कविताओं का संग्रह बाद में छाप भी दिया गया, जिसका नाम है ‘पहाड़ आगे: पहाड़ भीतर’, इसमें श्री मनराल के आक्रोशी स्वरों की 23 कवितायें संग्रहीत हैं। वे फिर से लिखने लगे, लेकिन रुग्ण ही रहे। रुग्णता के कारण 25 वर्ष की शासकीय सेवा के उपरांत 1989 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली, लेकिन अपने अंदर के सृजनात्मक आवेग को अवरुद्ध नहीं होने दिया। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा निवासी होने के कारण वे अल्मोड़ा आ गये जहाँ उन्हें अनुकूल और सहज परिवेश मिला। अल्मोड़ा आकर भी उन्होंने अपनी साहित्य साधना जारी रखी। 1996 से कत्यूरी प्रकाशन, नई दिल्ली की एक शाखा नरसिंहबाड़ी अल्मोड़ा में खोली और ‘कत्यूरी मानसरोवर’ त्रैमासिक पत्रिका नियमित रूप से बिना किसी शासकीय-अशासकीय मदद व बिना किसी विज्ञापनों के निकालते रहे। उन्होंने इस पत्रिका के द्वारा नये कवियों, लेखकों और पाठकों को एक मंच प्रदान करने की पुरजोर कोशिश की। वे कुछ समय से ‘धर्मयुद्ध’ पत्रिका का भी संपादन कर रहे थे। अल्मोड़ा आने के बाद 1996 से लेकर अपने जीवन के अंत तक रुग्णता की स्थिति में भी वे साहित्यिक गोष्ठियों द्वारा अल्मोड़ा के साहित्यिक वातावरण को जीवंत रखने का प्रयास करते रहे।मेरे आवास ‘सृजनधाम’ में आयोजित साहित्यिक गोष्ठियों में हर बार आते थे और कहते थे कि मुझे रचनाकारों की विविध रचनाओं से जीवन को आगे बढ़ाने की ऊर्जा मिलती है। वे हर बार लेखकों और रचनाकारों को यही कहते थे कि जो भी लिखो निडर होकर लिखो। सच को सच और झूठ को झूठ कहने की हिम्मत जुटाकर लिखो। क्योंकि तुम्हारे पास सबसे बड़ी ताकत है – कलम की ताकत। सचमुच श्री मनराल एक जीवट और अपराजेय लेखक ही थे। 1960 के बाद उन्होंने बहुत कुछ लिखा और कहानीकार के रूप में अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई। अपनी लेखनी के माध्यम से श्री मनराल ने पहाड़ के जीवन का अति सूक्ष्म चित्रण पूरी ईमानदारी के साथ किया। उन्होंने बिना किसी डर के पहाड़ की समस्याओं तथा प्रदूषित राजनीति एवं सत्ताधारी नेताओं की कथनी एवं करनी पर अपनी कविताओं के माध्यम से कड़े प्रहार किये। श्री बलवंत मनराल के जीवन को आगे बढ़ाने में और उन्हें लिखने की प्रेरणा देने में शिक्षिका रह चुकी उनकी पत्नी श्रीमती सुधा मनराल का विशेष योगदान रहा है। अपनी पत्नी के विशेष योगदान और सहयोग से वे अल्मोड़ा के नरसिंहबाड़ी स्थित अपने आवास में हर साल अपनी जन्म तिथि 10 अगस्त को साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन कर रचनाकारों को नित नया लिखने की प्रेरणा देते थे। अपने अल्प जीवनकाल में श्री मनराल ने ‘पहाड़ आगे: भीतर पहाड़’; ‘धीरो बैणा धीरो’; ‘महानगर का आदमी’; ‘प्रचण्ड शौर्य का महासूर्य’; ‘खड़े ठाड़े (हास्य व्यंग्य)’; ‘उलट-फेर (कहानी संग्रह)’; ‘बिन पायों का पलंग’; ‘एक खून यह भी (कहानी संग्रह)’; ‘कैक्टस (लघु कथा संग्रह)’; ‘मेल मिलावट जिंदाबाद (हास्य व्यंग्य)’; ‘श्री शिष्य देव गुरू अनीति कथा (हास्य व्यंग्य लघु उपन्यास)’; ‘गऊ, दूध और पानी (हास्य व्यंग्य रचनायें)’; ‘सागर रत्न और पत्थर (हास्य व्यंग्य कहानियाँ)’; ‘सर्दियाँ अल्मोड़े की (काव्य संकलन)’; ‘अटल पहाड़ चलता है (काव्य संकलन)’; ‘बुराँश के फूल हैं (कविता संग्रह)’; ‘चुनाव चक्कलस (हास्य व्यंग्य)’; ‘कभी न होगा अंत (कविता संग्रह)’; ‘बजते बाजे’; ‘कैसी बोली किसकी’; ‘सुमन एक उपवन के (बाल कविता संग्रह)’; ‘जो जागे सो पावे (बाल कहानी संग्रह)’, इत्यादि अनेक पुस्तकें लिखकर साहित्य के क्षेत्र में अपना नाम अमर कर गये।

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